राजस्थान का एकीकरण किस प्रकार हुआ।

By | May 21, 2020

राजस्थान की एकीकरण की अवस्थाए

राजस्थान का एकीकरण की समस्या काफी जटिल थी भारत की स्वतन्त्रता के समय राजस्थान मे छोटे बड़े 24 राज्य थे प्रत्येक राज्य का अलग राजा हुआ करता था या सब मिल कर एक संगठित छेत्र का निर्माण करते थे स्वतन्त्रता प्राप्त करने से पहले तक देसी राज्यो की राजनीति का संचालन भारत सरकार का राजनेतिक विभाग करता था।

ओर इसे समाप्त कर दिया गया ओर 5 जुलाई 1947 को सरदार बल्लभ भाई पटेल की अधीन, रियासते सचिवालय की स्थापना की गई । सयुक्त राज्य के निर्माण मे भाषा भोगोलिक सीमा संस्कृति को आधार बनाया गया।

भारत सरकार ने रियसती विभाग ने राजस्थान के भी विभिन राज्यो को संगठित कर एकीकृत राजस्थान का निर्माण करने का निश्चय किया यहा कार्य पाच चरणों मे संपन किया गया सबसे पहले अलवर भरतपुर धौलपुर व करौली को मिलाकर मत्स्य संघ का निर्माण किया गया।

दूसरे चरण मे प्रथम सयुक्त राजस्थान का निर्माण किया गया इसमे कोटा बूंदी झालावाड़ टोंक किशनगढ़ बांसवाड़ा डुंगरपुर प्रतापगढ़ ओर शाहपुरा के राज्यो को शामिल किया गया।

तीसरे चरण मे उदयपुर राज्य को भी प्रथम चरण के समान राजस्थान मे शामिल कर लिया गया छोटे चरण मे राजस्थान के शेष राज्यो को मिलकर राजस्थान का निर्माण हुआ इसमे जयपुर जोधपुर बीकानेर ओर जैसलमर राज्यो को शामिल किया गया।

अंतिम चरण मे मत्स्य संघ को भी एकीकृत राजस्थान मे सम्मिलित कर लिया गया बाद मे अजमेर मेरवाड़ा ओर सिरोही राज्यो को भी राजस्थान मे मिला दिया।

मत्स्य सघ का निर्माण

मत्स्य सघ का निर्माण 18 मार्च 1948 को हुआ था इसमे धोलपुर अलवर भारतपुर ओर करौली राज्यो को संगठित किया स्वतन्त्रता प्राप्त से पहले भारत मे सांप्रदायिक दंगो का ज़ोर था। चारों ओर लड़ाई का माहोल बना हुआ था ओर चारो तरफ तनाव बढ़ रहा था ओर अलवर तथा भरतपुर मे दंगो का प्रभाव अधिक था अलवर मे मेव जाती के लोग आतंक फैला रखा था।

राजस्थान का एकीकरण

सरदार पटेल ने अक्तूम्बर 1947 मे अलवर व भरतपुर के नरेशो एंव डा॰ खरे की एक सभा बुलाई थी। सभा मे सांप्रदायिक शांति कायम रखने का सुलभ विचार किया गया पर डा॰ खरे का रूख रूखा था उन्हे अलवर के आंतरिक शासान मे बाहरी हस्तशेप पसंद नहीं था।

इसी के बीच भारत सरकार के मुख्यमंत्री डा खरे को हटाना सही समझा इसी समय या कहे तो इसी बीच मे महात्मा गांधी की गोली मारकर हत्या कर दी गई हत्या के कारण तरह तरह की अफवाए फैलाने लगी स्थिति आधिक खराब हो गई ओर डा खरे को ओर अलवर के नरेश को हत्याकांड की जांच पूरी होने तक दिल्ली मे रखा गया ओर भरतपुर मे रेलगाड़िया जलायी जने लगी ओर रेलगाड़िया लूटे जाने लगी ओर मुसलमानो के साथ दुरवेवहार किया जाने लगा।  इस दुरवेवहार के कारण भरतपुर नरेश को शासन व्यवस्था भारत सरकार को सौपने की सलाह दी गई जिसे राजा ने स्वीकार कर लिया।

उधर हत्याकांड की जांच का कार्य पूरा हो गया अलवर नरेश को ओर डा खरे व भरतपुर महाराज को सम्मानित निर्दोष घोषित किया गया।

ओर अलवर भरतपुर धौलपुर व करौली राज्यो जिनकी भौगोलिक आपस मे जुड़ी थी, के राजाओ को दिल्ली मे बुलाकर एक बेठक कि गई इस बेठक मे चारों राज्यो को मिलकर एक संघ बनाने का प्रस्ताव रखा गया चारों राजाओ ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया ओर मणिक लाल मुंशी के कहने पर इस संघ का नाम मत्स्या संघ रखा गया ओर प्राचीनकाल मे भी इस क्षेत्र ईसी नाम से जाना जाता था धौलपुर महाराजा को संघ का राज प्रमुख बनाया गया इस तरह राजस्थान के निर्माण का  प्रथम चरण पूरा हुआ। राजस्थान का एकीकरण का कार्य कोई सरल कार्य नहीं था।

दूसरी अवस्था ( II )

राजस्थान के छोटे छोटे राज्यो के बीच ओर भारत सरकार के बीच बात चल रही थी कि उनका राजनैतिक भविस्य केसा होगा प्रारम्भ मे कोटा झलवाड़ा ओर डुंगरपुर के राजाओ कि ओर से प्रस्ताव आया ओर इनहोने एक सभा बुलाई इनका मानना था कि छोटे छोटे राज्यो का अपने अपने साधनो से उन्नित करना संभव नहीं होगा।

तीनों शासको ने दिल्ली मे भारत सरकार से संघ बनाने का अनुरोध किया लेकिन सरकार ने उदयपुर राज्यो को भी संघ मे सामील होने का सुझाव दिया जिसे उन्होने स्वीकार कर लिया परंतु उदयपुर राज्यो ने भारत सरकार को सुझाव दिया कि दक्षिण पूर्वी राजस्थान के सभी राज्यो को उदयपुर राज्यो मे सम्मिलित कर दिया जावे यह सुझाव भारत सरकारी ओर अन्य राज्यो स्वीकार नहीं था अत 25 मार्च 1948 को बांसवाड़ा डुंगरपुर झालावाड़ा बूंदी किशनगढ़ कोटा प्रतापगढ़ शाहपुर ओर टोंक राज्यो का विलिनीकरण कर प्रथम सयुक्त राजस्थान कि स्थापना कि गई।

तीसरा चरण ( III )

तीसरे चरण मे उदयपुर को राजस्थान मे सम्मिलित किया गया उदयपुर के महारणा ने सयुक्त राजस्थान मे सम्मिलित होने का प्रस्ताव रखा इसी बीच राजस्थान के विधिवत उढ़घातन की तैयारी चल रही थी इसी बीच 28 मार्च 1948 को उदयपुर महारणा के दीवान ने दिल्ली मे गृह मंत्रालय को लिखित मे सूचना दी की उदयपुर राज्य सयुक्त राजस्थान मे कुछ शर्तों के साथ मे सामील होने के लिए तैयार है ।

शर्ते जो कि इस प्रकार है।

पहली शर्त उदयपुर मे महारणा को सयुक्त राजस्थान का राजप्रमुख बनाया जाए ओर दूसरी शर्त यह थी की उन्हे 20 लाख रुपए वार्षिक प्रीवीपर्स दिया जाए उदयपुर को राजस्थान की राजधानी बनाया जाए ओर भारत सरकार ने इन मांगो पर कोटा डूंगरपुर ओर झालावाड़ के राजाओ से विस्तार से विचार कर निर्णय लिया की उदयपुर राज्यो को राजस्थान मे सम्मिलित कर लिया जाए उदयपुर के महारणा को राजस्थान का आजीवन राजप्रमुख माना गया लेकिन उनके उतराधिकारियों के लिए एसी वेवस्था नहीं थी उन्हे 10 लाख वार्षिक 5 लाख रूपाय भत्ता 5 लाख रूपाय दान धर्म आदि खर्च देना तह हुआ इस प्रकार प्रधान मंत्री नेहरू ने 18 अप्रैल 1948 को पुनगर्ठित सयुक्त राजस्थान का विधिवत उदघाटन किया।

राजस्थान का एकीकरण

चोथा चरण ( VI )

प्रथम तीन चरणों मे राजस्थान के निर्माण के बाद केवल जोधपुर बीकानेर जैसलमर तथा जयपुर राज्य राजस्थान मे शामिल होने के लिए शेष रह गए इन राज्यो मे से जोधपुर बीकानेर ओर जैसलमर राज्यो की सीमा पाकिस्तान से लगी हुई थी इनका सामरिक महत्व था तथा तीनों का एक बड़ा क्षेत्र रेगिस्तानी था जिस कारण यह क्षेत्र यातायात व संचार की दृष्टि पिछड़ा हुआ था

भारत सरकार का उद्देक्ष था की इन राज्यो को केंद्रीय शासन के अंतर्गत लिया जाए ओर राजस्थान मे सम्मिलित किया जाये उधर जैसलमर के अतिरिक्त बीकानेर जोधपुर ओर जयपुर राज्य अपनी अपनी अलग इकाई बनाए रखने के लिए प्रयत्नशील थे तथा जनता की भावना भी सम्पूर्ण राजस्थान को एक प्रांत के रूप मे देखने को उत्सुक थी।

भारत सरकार ने इन चारो राज्यो को राजस्थान मे मिलने का निश्चय किया लेकिन यह कार्य को आसान कार्य नहीं था जयपुर महाराजा की शर्त थी की राजस्थान की राजधानी जयपुर हो ओर उन्हे वांशुगत राजप्रमुख माना जाए दूसरी ओर उदयपुर महारणा को यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं था।

तथा जोधपुर भी राजधानी बनाए जाने का दावेदार था इन सभी शासको से विचार विमर्श कर निर्णय लिया गया की उदयपुर के महारणा को सम्मानित करने की द्रति उन्हे महाराज प्रमुख का पद दिया जाए ओर लेकिन यह पद उनकी मत्यु के साथ समाप्त समझा जाएगा

ओर जयपुर के महाराजा को राजप्रमुख भौगोलिक स्थिति ओर पेयजल की सुविधा को ध्यान मे रखते रखते हुये जयपुर को राजस्थान की राजधानी बनाए जाए सरदार पटेल ने उदयपुर यात्रा के दोरान एक जनसभा को संभोधित करते हुये 14 जनवरी 1949 को राजस्थान के निर्माण की घोषणा कर दी तथा 30 मार्च 1949 को उन्होने उसका विधिवत उढ़घातन किया। ओर राजस्थान का एकीकरण का कार्य धीरे धीरे होने लगा ।

अंतिम चरण

राजस्थान के निर्माण के बाद केवल सिरोही राज्य का प्रश्न बाकी रहा गया यह सुझाव दिया गया था की राजपूतना के कुछ राज्ये वेस्टर्न इंडिया ओर गुजरात स्टेट एजेंशी को सोफ़ा जाए जिनकी अधिकांश जनता गुजरती भाष बोलती है।

एसे राज्ये सिरोही पालनपुर दाता विजयनगर राज्यो को वेस्टन इंडिया तथा गुजराज स्टेट्स की एजेंसी को सोपने का निर्णय लिया गया झाबुआ बांसवाड़ा तथा डुंगरपुर मेवाड़ के अंग होने के कारण इन्हे राजपूतना स्टेट्स एजेंसी के अंतर्गत रखा गया 19 मार्च 1948 को गुजरात के राजाओ ने अपने राज्यो को बुम्बई प्रांत मे मिलने का फैसला किया गया। 

उस समय भारत सरकार को सिरोही राज्यो को मुंबई प्रांत से अलग रखना पड़ा सिरोही की रानी ने सलहकर तथा राजस्थान प्रांतीय कॉंग्रेस कमेटी के अध्येक्ष गोकुल भाई भट्ट से बातचीत कर भारत सरकार ने 8 नवम्बर 1948 को सिरोही का शासन स्वयम संभाल लिया ओर जनता मे विरोधी भावना पनपने लगी गुजरती लोगो ने यह मांग की की सम्पूर्ण सिरोही राज्यो को मुंबई प्रांत मे मिला दो।

जबकि राजस्थानी लोगो ने राजस्थान मे शामिल होने की मांग की अत अंत मे निर्णय लिया गया सम्पूर्ण सिरोही राज्यो को राजस्थान के साथ मिलना पड़ा ओर अब केवल अजमेर ओर मेरवाड़ा केंद्र शासित क्षेत्र बचा था जिसका भी वक्त रहते हुआ या बाद मे राजस्थान मे मिला लिया गया इस तरह सयुक्त राजस्थान का निर्माण हुआ।

ओर इस प्रकार राजस्थान का एकीकरण पूर्ण रूप से हो गया। ओर ओर राजस्थान का एकीकरण मे सरदार पटेल ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

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