meera bai Ka Jeevan Parichay । मीरा बाई का जन्म परिचय

By | May 17, 2020

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meera bai Ka Jeevan Parichay, भक्ति कालीन कवीओ मे मीरा का भी एक महत्व स्थान है जिस समय राजस्थान मे जंभौजी, दादू आदि संत धार्मिक ओर समाज सुधार के लिए प्रयास कर रहे थे उसी समय राजस्थान मे भक्ति रस की धारा बहाने वालों मे सन्त मीरा बाई sant meerabai  का स्थान भी सर्वोपरि है।

मीरा का प्रामाणिक तथा क्रमबद्ध जीवन उपलब्ध नहीं है डा गोपीनाथ के अनुसार मीरा का जन्म 1498-99 ई माना है ओर पाइमरम के अनुसार मीरा बाई meera bai का जन्म 1498 ई मे हुआ था। इतिहासकारो ओर किताबों मे मीरा का जन्म अलग अलग ज्ञात होता है । 

Meera Bai मीरा का जन्म मेड़ता से करीब 21 मिल दूर कुड़की नामक ग्राम मे हुआ था मीरा अपने पिता रत्नसिंह की एक लौती पुत्री थी जब मीरा केवल 2 वर्ष की थी तब उसकी माता का देहान्त हो गया ओर मीरा अपने दादा राव दुदा के पास रहने लगी राव दुदा एक कृष्ण भक्त थे।

मीरा के पिता रत्नसिंह चाचा ओर वीरमदेव ओर उसकी दादी सभी वैष्णव धर्म के उपासक थे मीरा बचपन से ही वैष्णव धर्म के वातावरण मे बड़ी हुई।

Meera Bai Ka Jeevan Parichay । मीरा का जन्म परिचय

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Mirabai History in Hindi मीरा मे कृष्ण भक्ति की भावना उसकी दादी की वजह से उत्त्पन हुई जब एक बार बरात को देखकर मीरा ने अपनी दादी से पूछा था की यह बारात किसकी है तो दादी ने उत्तर दिया यहा दूल्हे की बरात है। 

मीरा meera bai ने वापस प्रश्न किया की उसका दूल्हा कहा है तो दादी ने कहा की उसका दूल्हा तो गिरधर गोपाल है तभी से कहा जाता है मीरा ने गिरधर गोपाल को प्राप्त करने के लिए प्रयास करना सुरू कर दिया।

राव दुदा जो उसके दादाजी थे उन्होने पंडित गजाधर को मीरा को शिक्षा देने के लिए नियुक्त किया पंडित जी मीरा को अलग अलग कथा पुराण आदि सुनाये करते थे ओर मीरा थोड़े समय बाद पूर्ण विदुषी एवं पंडित बन गई।  

मीरा की प्रारम्भिक कठिनाई  – Mirabai मीरा के जीवन मे कठिनाई भरी थी ओर मीरा ने इन कठिनाइयों का सामना कृष्ण की भक्ति मे लिन रहकर किया 1516 ई मे मीरा का विवाह मेवाड़ के महारणा सांगा के पुत्र भोजरज के साथ कर दिया गया।

विवाह के सात वर्ष बाद ही भोजरज की मरत्यु हो गई मीरा को इससे भरी दुख हुआ ओर सदमा लगा मीरा का मन संसार ले उचट गया।

ओर मीरा बाई meera bai अपना अधिकांश समय सत्संग ओर भजन कीर्तनों मे बिताने लगी ओर मीरा के पिता रत्नसिंह भी बाबर से लड़ते हुए खनवा के युद्ध मे मारे गए 1528 मे महारणा सांगा भी चल बसे मीरा के दादा की मरत्यु 1515 के पहले हो चुकी थी।

इसके अलावा मालदेव ने मेड़ता पर अपना अधिकार कर लिया इस परेशानियों के कारण ओर एसी स्थिति मे मीरा को मेड़ता भी छोड़ना पड़ा ओर मीरा वापस मेवाड़ आना पड़ा।

जब मीरा बाई मेवाड़ आई तो उस समय मेवाड़ मे राजगद्दी के लिए राजपरिवार मे गृह कलेस हो रहा था राणा सांगा के बाद पहले रतनसिंह ओर बाद मे विक्रमादित्या मेवाड़ के शासक हुए ओर मीरा स्वतंत्र विचारो की थी ओर इन्ही स्वतंत्र विचारो के कारण राणा उससे नाराज थे।

मीरा बाई सादुओं की संगति मे बैठना ओर कृष्ण की मूर्ति के आगे नाचना आदि राणा को पसंद नहीं आया ओर राणा ने इसे अपने राजपरिवार की मर्यादों के विरुद माना एस भी कहा जाता है की राणा ने मीरा की जीवन लीला समाप्त करने के लिए उसे विष का प्याला ओर सर्प भेजा गया ।

लेकिन कृष्ण की कृपा से मीरा का कुछ भी नहीं बिगडा ओर मीरा को अनेक यातनाए दी ओर मीरा ने उन सभी कष्टों  को प्रसन्नपूर्वक सहन किया मीरा ने सब कुछ कृष्ण की भक्ति मे समर्पित कर दिया ओर राज परिवार की परम्पराओ की परवाह नहीं की।

मीरा बाई की कृष्ण के प्रति असीम भक्ति – मीरा बाई मे भगवान कृष्ण के प्रति अटूट आस्था ओर अटूट विश्वास था मीरा ने अटूट प्रेम के साथ स्वयम को भगवान कृष्ण के चरणों मे समर्पित कर दिया वह रात दिन भगवान कृष्ण के चरणों मे बेठी रहती ओर कृष्ण के भजन गाती रहती थी।

कुछ समय बाद मीरा मेड़ता को छोड़कर वृन्दावन चली गई ओर वह मीरा भगवान कृष्ण की भक्ति मे लिन हो गई।

कहा जाता है की एक दिन मीरा वृन्दावन के उच्चकोटी के संत रूप गोस्वामी से मिलने गई परंतु उन्होने मीरा से मिलने से इंकार कर दिया ओर कहा की वे स्त्रियो से भेट नहीं करते है इसके उत्तर मे मीरा ने कहला भेजा की क्या वृन्दावन मे पुरुष ही निवास करते है यदि वृन्दावन मे कोई पुरुष है तो वे है श्री कृष्ण है।

रूप गोस्वामी इस उत्तर को सुनकर मीरा से भेट करने को सहमत हो गए कुछ समय बाद मीरा द्वारिका चली गई वही रणछोरजी के मंदिर मे भगवान श्री कृष्ण की मूर्ति के सामने भजन कीर्तन करते हुये मीरा ने अपना शेष जीवन व्यतीत किया द्वारिका मे रहते हुये मीरा की मरत्यु हो गई।

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Meera Bai Ka Jeevan Parichay । मीरा का जन्म परिचय

meera bai ki rachnaye मीरा की रचनाये – मीरा बाई meera bai द्वारा रचित कही जाने वाली रचनाये जो अब तक प्राप्त हुई हे, उनकी कुल संख्या दस हे ये रचनाये हे (1) गीत गोविंद का टीका (2) नरसी जी का मायरा (3) राग सोरठ का पद (4) मलार राग (5) राग गोविंद, सत्य भामा नु रूसण (6) मीरा की गरीबी (7) रुक्मणी मंगल (8) नरसी मेहता की हुंडी (9) चरित (10) स्फुट पद इनमे से केवल स्फुट पद ही मीरा की प्रामाणिक रचना मानी जाती है।

मीरा बाई meera bai के स्फुट पद आजकल मीराबाई की पदावली के नाम से प्रकाशित रूप मे उपलब्ध हे मीरा की भाषा बोलचाल की राजस्थानी भाषा हे जिस पर ब्रज भाषा, गुजराती और खड़ी बोली का रंग चढा हुआ हे।

meera bai ,मीरा बाई की भक्ति – भावना – मीरा की कृष्ण भक्ति मे अटूट आस्था थी उसकी कृष्ण भक्ति तीन सोपनों से होकर गुजरती हे पहला  सोपान प्रारंभ मे उसका कृष्ण के लिए लालायित रहने का हे इस अवस्था मे वह व्याग्रता से गा उठी हे  मैं विरहनी बैठी जागू , जग सोवि री आली वह कह उठती  हे दरस बिन दूखण लागे नैन दूसरा सोपान वह हे जब उसे कृष्ण भक्ति से उपलब्धिया की प्राप्ति हो जाती है ।

वह कहती हे पायोजी मैंने राम रतन धन पायो तीसरा सोपान वह हे जब उसे आत्मबोध हो जाता हे जो सायुक्त भक्ति के चरम सीढ़ी हे वह अपनी भक्ति मे सरल भाव से ओत प्रोत होकर कहती हे म्यारे तो गिरधर गौपाल दूसरो न कोई  मीरा बाई meera bai अपने प्रियतम कृष्ण से मिलकर उनके साथ एकाकार हो जाती हे।

मीरा बाई meera bai की उपासना माधुर्य भाव की थी अर्थात वह अपने देव श्रीकृष्ण की भावना प्रियतम या पति के रूप मे करती थी कृष्ण को ही वह परमात्मा और अविनाशी मानती थी उसकी भक्ति की विशेषता यह थी उसमे ज्ञान पर उतना बल नहीं था जितना भावना पर था मीरा के पद अपनी तीव्र प्रेमानुभूति के कारण जनसाधारण मे अत्यंत लोकप्रिय बनते चले गए मीरा सगुण भक्ति की उपासिका थी ओर श्री कृष्ण उनके आराध्यदेव थे।

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