भारत के प्रमुख त्योहार । भारत मे मनाया जाने वाले त्योहार

By | May 20, 2020

गणगौर

भारत के प्रमुख त्योहार । Festivals of India

सांस्कृतिक विविधताओं से ओत-प्रोत राजस्थान एक ऐसा प्रदेश है जिसकी मिट्टी तीज त्योहारों की महक से सदैव गंधायित यह रहती है।

फागुन और होली के गीतों की गूंज समाप्त भी नहीं हो पाती है कि चेत के शुरू होते होते बालिकाओं के मधुर कंठ से गांव गांव में गणगौर के रसीले गीत गूंजने लग जाते हैं राजस्थान के सामाजिक और धार्मिक त्योहारों में गणगौर का त्योहार सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।

राजस्थानी सधवा एवं कुमारिया इसको असीम श्रद्धा और निष्ठा से मनाती है। विहान बेला में बाघों से कुंवारी और जिनकी अभी हाल ही में शादी हुई है।

वे बालिकाएं फूल और हरी कच्ची दूब चुनकर अपने कलशो में सजाकर गीत गाती हुई गुजरती है और पूजा स्थल की ओर बढ़ती हुई इस टोली का गीत स्वर उच्च होने लगता है ।

गणगौर के पूजन में स्त्रियां अपने सुहाग के अमर होने और भाई के लंबी आयु होने का वर मांगती है जो बालिकाएं अभी अविवाहित है वह अपने भाई के लिए सुंदर सुशील और सलोनी सी पत्नी की कामना करती है। और अप्रत्यक्ष रूप से अपने लिए भी श्री कृष्ण जैसा सुंदर सलोना वर मांगती है। यह त्यौहार एक वृत्त का भी अंग माना जाता है

स्त्रियां 15 दिन तक व्रत रखते हुए शिव पार्वती की पूजा करती है वृत होलिका दहन से प्रारंभ होकर चैत्र शुक्ला एकम या कही कही तृतीया तक समाप्त होता है।

इस अवसर पर होली की राख के पिंड भी बनाए जाते हैं। और यव के अंकुरों के साथ इनका पूजन होता है इस अवसर पर स्त्रियां चूड़ा चुंदड़ी कि अक्षयता की कामना करती है और उसी के उपलक्ष में विविध नृत्य का आयोजन और गीतों का गायन होता है।

गणगौर का त्योहार शिव पार्वती के रूप में इसरजी और इसरीजी की (गौरी) की प्रतिभाओं के पूजन द्वारा मनाया जाता है इस त्यौहार को जयपुर जोधपुर उदयपुर कोटा आदि राज्यों में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता था जिसमें स्वयं राज्यों के राजा उनके सामंत और कर्मचारी गणगौर की सवारी में सम्मिलित होते थे कोटा में तो अनेक जातियों की स्त्रियां जिनमें कुंजडिया लखारन भडभूंजा आदि सम्मिलित होती और राजप्रसाद के आंगन में आकर नृत्य करती थी उदयपुर मैं मनाए जाने वाले त्योहार में गणगौर की सवारी का कर्नल टॉड और कविराज श्यामलदास ने बड़ा रोचक वर्णन किया है।

यहां अटालिकाओ में बैठकर सभी जातियों की स्त्रियां बच्चे और पुरुष रंग रंगीली वस्त्र व आभूषणों से सुसज्जित हो गणगौर की सवारी देखते थे सवारी तोप के धमाके नगाड़े की आवाज के साथ के साथ राजप्रसाद से आरंभ होकर पिछोला तालाब के गणगौर घाट तक धूमधाम से पहुंचती थी और नौका बिहार तथा आतिशबाजी के प्रदर्शन के बाद समाप्त होती थी उदयपुर में गणगौर का त्योहार दो बार मनाया जाता था एक चेत्र वदि 3 को  और दूसरा वैशाख वदी 3 को दोनों का उत्सव एक जैसा ही होता था वैशाख वदि 3 के त्यौहार को धींगा गणगौर कहा जाता था।

घुडला का त्योहार

चेत्र कृष्णा अष्टमी को घुडला का त्यौहार मनाया जाता है। इस त्यौहार के संबंध में कहा जाता है कि अजमेर के शासक मल्लू खा 1491 में पीपाड़ जिला जोधपुर पर आक्रमण कर 140 तीजनियो (गणगौर का वृत रखने वाली स्तरीय) को बंदी बना लिया जब जोधपुर के शासक राव सातल को इस बारे में सूचना मिली तब वहां सेना लेकर घोषणा पहुंचा जहां मल्लू खा की सेना पड़ी थी.

राव सातला ने इस सेना के सेनापति मीर घुडले खा को तीरों से छेद कर मार डाला और तिजनियों को मल्लू खा की कैद से छुड़ा लिया घुडले खा की पुत्री गिनदोली को भी कैद कर लिया राव सातल घायल हुआ और 13 मार्च 1491 को उसकी मृत्यु हो गई इस विजय की याद में इस त्यौहार पर अनेक छिद्रो से युक्त एक घड़े में दीपक जलाया जाता है

घड़ा घुडेल खा के तीरों से छिदे हुए शरीर का और दीपक उसकी आत्मा का प्रतीक है यह घड़ा चैत्र शुक्ला द्वितीय को या तोड़फोड़ दिया जाता है या पानी में डुबो दिया जाता है गणगौर त्यौहार के दिनों में गणगौर के गीतों के साथ घुडले के गीत भी गाए जाते हैं गीतों के प्रसाद रूप में लोग कन्याओं को पैसे गुड बताशे आदि देते हैं ।

श्रावणी तीज

राजस्थान की तीज का त्यौहार संपूर्ण भारत में प्रसिद्ध है तीज का त्योहार ऋतू प्रधान होते हुए भी भावकता से अधिक संबंधित है वर्षा ऋतु के महीनों में जब पावस की रिमझिम और चारों ओर हरियाली अपने सौंदर्य से भरी धरती को महका महका देती है ।

तब इस छटा का उल्लास तीज के त्यौहार के रूप में दिखाई देता है वर्षा ऋतु जब अपने पूर्ण यौवन में होती है और जब प्रकृति पूरी हरियाली से ओत-प्रोत होती है नदी नाले बहने लगते हैं और सरोवर पूरे भरे जाते हैं ऐसे हरियाली के वातावरण में यहां त्यौहार बड़े हर्षोल्लास से मनाया जाता है।

श्रावण शुक्ला तृतीय को बालिकाएं एवं नवविवाहित बधूए इस त्यौहार को मनाती है 1 दिन पूर्व वे हाथों और पैरों में मेहंदी लगाती है और दूसरे दिन वह अपने पीहर जाती है।

जहां उन्हें नई पोशाक के कपड़े दी जाती है और विविध पकवान के भोजन से उसे तृप्त किया जाता है तीज का त्यौहार विवाह के बाद पीहर में मनाने की परंपरा है।

राजस्थान में एक प्रथा है कि वह विवाह के बाद के पहले श्रावण में सास और बहू को कभी साथ नहीं रहना चाहिए इसलिए ससुराल वाले किसी अनिष्ट के भय से उसे पीहर भेज देते हैं श्रावण के महीने में तीज के अवसर पर सभी नवविवाहिताए पेड़ पर झूला डालकर झूलती है साथ-साथ ऋतू और श्रंगार से संबंधित गीत गाती है झूला झूलते समय नवविवाहित स्त्रियां मनोविनोद भी करती है।

इस त्यौहार के अवसर पर राजस्थान में स्थान स्थान पर झूले लगते हैं और सरोवर के तट पर मेलों का आयोजन होता है यहां प्रेमिकाए अपने प्रेमियों को देखकर शृंगार रस प्रधान गीतो को गाती है और नृत्य करती है राजस्थान में तीज का त्यौहार गुलाबी नगर जयपुर में प्रमुख रूप से मनाया जाता है।

यहां यह त्यौहार बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है राजस्थान के कोने-कोने से लाखों की संख्या में लोग यहां आकर इस त्योहार का आनंद व लुफ्त उठाते हैं राजस्थानी वेशभूषा पहने लोग राजधानी लोकगीत और नृत्य करते नजर आते हैं इस प्रकार जयपुर का तीज का त्योहार केवल राजस्थान में ही नहीं बल्कि पूरे भारत में प्रसिद्ध है । और पूरे भारत में इस त्यौहार को अच्छी तरह से मनाते हैं।

रक्षा बंधन

रक्षा बंधन एक त्योहार है जो एक भाई और बहन के बंधन को मनाता है। यह त्योहार हिंदू धर्म में मनाया जाता है। यह उनके सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है। इसके अलावा, बहनें और भाई साल भर इसके लिए बेसब्री से इंतज़ार करते हैं। भारत में लोग इसे बहुत उत्साह के साथ मनाते हैं।

इसी तरह, यह मायने नहीं रखता कि आप बच्चे हैं या वयस्क, सभी उम्र के भाई-बहन रक्षाबंधन मनाते हैं। इसके अलावा, यह उनके बीच के बंधन को भी मजबूत करता है। ‘रक्षा’ सुरक्षा के लिए अनुवाद करती है रक्षा बंधन हिंदू कैलेंडर के बाद मनाया जाता है। यह सावन के महीने में आता है और लोग इसे महीने के आखिरी दिन मनाते हैं। यह शुभ त्योहार आमतौर पर केवल अगस्त के आसपास आता है।

जैसा कि हम सभी जानते हैं कि भाई-बहन हमारे दिलों में एक खास जगह रखते हैं। हालाँकि, एक भाई और बहन का विशेष बंधन बहुत ही अनोखा होता है। एक दूसरे के लिए उनकी देखभाल कोई सीमा नहीं है। उनके द्वारा साझा किया गया प्यार तुलना से परे है।

चाहे वे एक दूसरे से कितना भी लड़ें, वे हमेशा समर्थन में उनके पीछे खड़े रहते हैं। भाई-बहन तुच्छ मामलों को लेकर एक-दूसरे से लड़ते हैं। दूसरे शब्दों में, वे एक बंधन साझा करते हैं जो चिढ़ा और प्यार से भरा होता है।

भाई-बहन हमारी तरक्की में मदद करते हैं। हमारे जीवन के प्रत्येक चरण में, उनके बीच का बंधन मजबूत होता है। वे मोटी और पतली के माध्यम से एक दूसरे के साथ खड़े होते हैं। बड़े भाई अपनी बहनों की बहुत रक्षा करते हैं। इसी तरह, बड़ी बहनें अपने छोटे भाइयों की बहुत देखभाल करती हैं। छोटे अपने बड़े भाई-बहनों को देखते हैं।

रक्षा बंधन इस बंधन को मनाने के लिए है। यह दोनों द्वारा साझा किए गए अद्वितीय और विशेष संबंधों का प्रतीक है। इस दिन को एक अच्छे समय के लिए सही पहचाना गया है और इस खूबसूरत बंधन पर ध्यान केंद्रित किया गया है। यह उनके प्यार, एकजुटता और एक-दूसरे पर विश्वास का प्रतीक है।

रक्षा बंधन बहनों के लिए लाड़ प्यार का समय है। इस शुभ अवसर पर, बहनें अपने भाई की कलाई पर एक पवित्र धागा यानी राखी बांधती हैं। ऐसा अच्छे स्वास्थ्य और लंबे जीवन की कामना के इरादे से किया जाता है।

दूसरी ओर, भाई बदले में, अपनी बहनों को आशीर्वाद देते हैं और उनकी रक्षा करने की प्रतिज्ञा करते हैं और जीवन भर उनकी देखभाल करते हैं। इस दिन बहनों को बहुत प्यार और लाड़-प्यार मिलता है। यह चॉकलेट, उपहार, पैसे, कपड़े और बहुत कुछ के रूप में है।

परिवार के सदस्य इस अवसर के लिए तैयार होते हैं, आमतौर पर जातीय परिधान में। हम रंगीन राखियों और उपहारों से भरे बाजारों को देखते हैं।

हर साल फैशनेबल और ट्रेंडी राखी बाजार के चक्कर लगाते हैं। महिलाएं अपने भाइयों के लिए उत्तम राखी की खरीदारी करती हैं और पुरुष अपनी बहनों के लिए उपहार खरीदने के लिए बाहर जाते हैं।

अंत में, रक्षा बंधन सबसे सुखद त्योहारों में से एक है। यह भाई और बहन को अपने बंधन को मजबूत करने के लिए देता है। आजकल, ऐसी बहनें भी जिनके भाई नहीं हैं, अपनी बहनों के साथ रक्षा बंधन मनाती हैं। त्योहार का सार फिर भी वही रहता है।

दशहरा

भारत के प्रमुख त्योहार । Festivals of India

यह त्यौहार आश्विन शुक्ला दशमी को मनाया जाता है वैसे तो भारत के अन्य भागों में भी इसे मनाया जाता है। लेकिन राजस्थान में शोर्य की प्रमुखता के कारण इसका महत्व और भी अधिक बढ़ गया है।

ऐसी मान्यता है कि इसी दिन श्रीराम ने रावण पर विजय प्राप्त की थी यह विशेषकर क्षत्रियों का त्यौहार है जिसे दुर्गा स्थापना व दुर्गा अष्टमी और नवरात्रि से भी जोड़ दिया जाता है।

दुर्गा स्थापना से 9 दिनों तक दुर्गा की पूजा-अर्चना की जाती है दुर्गा योद्धाओं की देवी कही जाती है नवरात्रि में 9 दिनों तक सप्तशती का पाठ किया जाता है हकीकत बही में एक पत्र की नकल मिलती है जो महाराजा विजय सिंह ने नागौर के एक अधिकारी को लिखा था जिसमें इस त्यौहार को किस तरह मनाना है इसके बारे में निर्देश दिए गए निर्देशों से इस अवसर पर मनाए जाने वाले रीति रिवाजों औपचारिकताओं का ज्ञान प्राप्त है।

इस पत्र के अनुसार प्रथम दिन देवी दुर्गा की प्रतिमा स्थापित की जाती थी और मिट्टी के पात्र में जवारा बोए जाते थे और उनकी पूजा की जाती थी आठवीं दिन नो कुमारी कन्याओं की जो देवी दुर्गा की प्रतीक स्वरूप होती थी पूजा अर्चना की जाती थी।

नौवे दिन हवन करके अग्नि को आहुतियां दी जाती थी और भोज आदि के सात नवरात्रि का उत्साह समाप्त होता था देवी दुर्गा की प्रतिमा और जवारा के पात्र को नृत्य गान के साथ किसी जलाशय पर ले जाया जाता था। जहां उसका विसर्जन किया जाता था।

नवरात्रि के दूसरे दिन दशहरा का त्यौहार मनाया जाता है राजस्थान में दशहरे का त्यौहार राज्य की ओर से बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है राज्य के शासक दरबार लगाते हैं थे सामंतो से नजराना ग्रहण करते थे और योग्य एवं सुपात्र अधिकारियों के पद व सम्मान देने की घोषणा की जाती थी ।

दीवाली

भारत के प्रमुख त्योहार । भारत मे मनाया जाने वाले त्योहार

भारत के प्रमुख त्योहार । Festivals of India

भारत के प्रमुख त्योहार । Festivals of India

सबसे पहले, यह समझें कि भारत त्योहारों की भूमि है। हालांकि, कोई भी त्योहार दिवाली के करीब नहीं आता है। यह निश्चित रूप से भारत में सबसे बड़े त्योहारों में से एक है। यह शायद दुनिया का सबसे चमकीला त्योहार है।

विभिन्न धर्मों के लोग दिवाली मनाते हैं। सबसे उल्लेखनीय, त्योहार अंधेरे पर प्रकाश की जीत का प्रतीक है। इसका अर्थ यह भी है कि बुराई पर अच्छाई की जीत और अज्ञान पर ज्ञान। इसे रोशनी के त्योहार के रूप में जाना जाता है। नतीजतन, दीवाली के दौरान पूरे देश में उज्ज्वल रोशनी होती है।

यह भारत में एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में भिन्न होता है। दिवाली के साथ कई देवताओं, संस्कृतियों और परंपराओं का जुड़ाव है। इन मतभेदों का कारण संभवतः स्थानीय फसल त्योहार हैं। इसलिए, इन कटाई त्योहारों का एक अखिल हिंदू त्योहार में संलयन था।

रामायण के अनुसार, दिवाली श्रीराम की वापसी का दिन है। इस दिन भगवान राम अपनी पत्नी सीता के साथ अयोध्या लौटे थे। यह वापसी राम द्वारा राक्षस राजा रावण को पराजित करने के बाद की गई थी। इसके अलावा, राम के भाई लक्ष्मण और हनुमान भी अयोध्या विजयी हुए।

दिवाली के कारण के लिए एक और लोकप्रिय परंपरा है। यहाँ भगवान विष्णु ने कृष्ण के अवतार के रूप में नरकासुर का वध किया। नरकासुर निश्चय ही एक राक्षस था। इन सबसे ऊपर, इस जीत ने 16000 बंदी लड़कियों की रिहाई की।

इसके अलावा, यह जीत बुराई पर अच्छाई की जीत को दर्शाती है। इसका कारण भगवान कृष्ण का अच्छा होना और नरकासुर का दुष्ट होना है।

देवी लक्ष्मी को दीवाली का संघ कई हिंदुओं की मान्यता है। लक्ष्मी भगवान विष्णु की पत्नी हैं। वह धन और समृद्धि की देवी भी बनती है।

एक पौराणिक कथा के अनुसार, दिवाली लक्ष्मी विवाह की रात है। इस रात उसने विष्णु को चुना और विदा किया। पूर्वी भारत के हिंदू दिवाली को देवी दुर्गा या काली के साथ जोड़ते हैं। कुछ हिंदू दीवाली को एक नए साल की शुरुआत मानते हैं।

सबसे पहले, कई लोग दिवाली के दौरान लोगों को माफ करने की कोशिश करते हैं। यह निश्चित रूप से एक ऐसा अवसर है जहां लोग विवादों को भूल जाते हैं। इसलिए, दीवाली के दौरान दोस्ती और रिश्ते मजबूत होते हैं। लोग अपने दिल से नफरत की सभी भावनाओं को दूर करते हैं।

यह खूबसूरत त्योहार समृद्धि लाता है। हिंदू व्यापारियों ने दिवाली पर नई खाता बही खोली। इसके अलावा, वे सफलता और समृद्धि के लिए भी प्रार्थना करते हैं। लोग अपने लिए और दूसरों के लिए भी नए कपड़े खरीदते हैं।

यह प्रकाश पर्व लोगों को शांति प्रदान करता है। यह हृदय में शांति का प्रकाश लाता है। दिवाली निश्चित रूप से लोगों को आध्यात्मिक शांति प्रदान करती है। खुशी और खुशी साझा करना दिवाली का एक और आध्यात्मिक लाभ है।

रोशनी के इस त्योहार के दौरान लोग एक-दूसरे के घरों में जाते हैं। वे खुश संचार करते हैं, अच्छा भोजन करते हैं, और आतिशबाजी का आनंद लेते हैं।

अंत में, इसे योग करने के लिए, भारत में दिवाली एक महान खुशी का अवसर है। कोई भी इस शानदार त्योहार के आनंदमय योगदान की कल्पना नहीं कर सकता है। यह निश्चित रूप से दुनिया के सबसे महान त्योहारों में से एक है।

मकर संक्रांति

मकर संक्रांति के दिन, भगवान सूर्य अपने पुत्र भगवान शनि से मिलते हैं। भगवान शनि मकर राशी पर शासन कर रहे थे। वैदिक ज्योतिष के अनुसार, भगवान सूर्य और भगवान शनि अच्छी तरह से नहीं जा सकते। इसलिए मकर संक्रांति पर, कड़वे अतीत को भुला दिया जाता है और नई शुरुआत की जाती है।

महाभारत के अनुसार, घायल भीष्म ने मकर संक्रांति पर अपने शरीर को छोड़ने के लिए चुना और अपने शरीर को छोड़ दिया ताकि वह स्वर्गीय घर प्राप्त कर सकें। तो तब से यह माना जाता है कि जो भी मकर संक्रांति पर मरता है वह निर्वाण को प्राप्त करेगा।

मकर संक्रांति के दिन, राजा भागीरथ पवित्र गंगा नदी को पृथ्वी पर ले आए और राजा सागर के पुत्रों की आत्माओं को मुक्त किया।

मकर संक्रांति 14 जनवरी को मनाई जाती है। यह एकमात्र ऐसा त्योहार है जो कुछ अपवादों को छोड़कर उसी दिन मनाया जाता है। इस दिन सूर्य मकर राशी में अपना अंक बदलता है।

मकर संक्रांति को अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग तरह से मनाया जाता है। भक्त पवित्र नदियों में स्नान करते हैं और सूर्य देव की प्रार्थना करते हैं। दक्षिण भारत में मकर संक्रांति को पोंगल के नाम से जाना जाता है।

पंजाब में इसे माघी के नाम से जाना जाता है। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में इसे संक्रांति के रूप में जाना जाता है और चार दिनों के लिए मनाया जाता है। वे क्रमशः भोगी, मकर संक्रांति, कानुमा और मुकनुमा हैं।

असम में इसे भोगली बिहू के रूप में मनाया जाता है जो एक फसल उत्सव है। बिहार और झारखंड में यह 14 और 15 जनवरी को मनाया जाता है। इसे संक्रांति या सकरावत या खिचड़ी के रूप में जाना जाता है और इस त्योहार पर तीली बर्फी बनाई जाती है।

दिल्ली और हरियाणा में, भाई शादीशुदा बहन को सिधा उपहार देते हैं। गोवा में महिलाएं हल्दी-कुमकुम करती हैं। गुजरात में इसे उत्तरायण कहा जाता है। यह दो दिनों के लिए मनाया जाता है और यह उनके लिए महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है।

गुजराती लोग इस त्योहार पर पतंग उड़ाते हैं जिसे पतंगी के नाम से जाना जाता है। हिमाचल प्रदेश में इसे माघ साजी के नाम से जाना जाता है।

कर्नाटक में बच्चे नए कपड़े पहनते हैं और निकट और प्रिय लोगों के साथ संक्रांति के प्रसाद के लिए जाते हैं। इस दिन कई मेलों का आयोजन किया जाता है। कुंभ मेला सबसे प्रसिद्ध है जो चार पवित्र स्थानों में 12 वर्षों में एक बार आयोजित किया जाता है।

होली

भारत के प्रमुख त्योहार । भारत मे मनाया जाने वाले त्योहार

भारत के प्रमुख त्योहार । Festivals of India

फाल्गुन मास की पूर्णिमा को यह त्यौहार मनाया जाता है या मुख्यतः निम्न जातियों का त्यौहार है यह हिंदुओं का एक अत्यंत लोकप्रिय और प्रसिद्ध त्योहार है इसे सभी स्त्री-पुरुष बालक बूढ़े आदि बड़े आनंद और उल्लास के साथ मनाते हैं।

इस त्यौहार को मनाने में ऊंच-नीच धनी निर्धन आदि का कोई भेद नहीं किया जाता होली के वास्तविक दिन के लगभग एक माह पहले शमी के वृक्ष को काटा जाता है होली के दिन एक गड्ढा खोदकर उसमें ईंधन जमा करते हैं।

ईंधन में लकड़ी के अलावा गोबर के थेपड़े भी होते हैं होली के 15 दिन पहले ही फागुन के गीत गाए जाते हैं रात में लोग एकत्रित होकर गीदड़ आदि का आयोजन करते हैं लोकगीतों के साथ चंग का उपयोग भी होता है।

होली के 3 दिन पहले स्त्रियां और कुमारिया गोबर के बड़कुल्ले बनाती है जिनके बीच में छिद्र होते हैं ऐसी मान्यता है कि बढ़ कुल्ले उनकी विभिन्न प्रकार के रोगों से रक्षा करते हैं होली जलाने से पहले परिवार के लोग बड़कुल्ले गेहूं या जो कि कुछ बालिया लेकर होलिका के स्थान पर जाते हैं।

होली जलने पर उसमें बड़ बड़कुल्ले फेंक दिए जाते हैं तथा गेहूं या जो कि बालिया भूनकर तथा होली की पांच बार परिक्रमा कर लोग अपने अपने घर चले जाते हैं होली का अगला दिन धुलन्डी कहलाता है इस दिन स्त्री और पुरुष एक-दूसरे पर रंग अबीर और गुलाल डालते हैं।

गले मिलते हैं हंसी मजाक करते हैं लोग पिचकारीयो से रंग छोड़ते हैं इस दिन लोग किसी प्रकार की हंसी मजाक को बुरा नहीं मानते हैं इस प्रकार यह त्यौहार पुरानी शत्रुता समाप्ति कर अपूर्व अवसर प्रदान करती है रंग खेलना दोपहर तक चलना रहता है दोपहर बाद लोग अपने घर जाकर स्नान आदि करके साफ-सुथरे कपड़े पहन कर एक दूसरे के घर अभिवादन करने जाते हैं।

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