तानाजी मालसुरे की कहानी हिन्दी मे | कोड़ाना का किला

By | February 8, 2020

तानाजी एक वीर योद्धा थे पूरी कहानी हिन्दी मे

तानाजी मालसुरे एक वीर योद्धा थे ओर शिवाजी का गहरे ओर घनिष्ठ मित्र थे तानाजी का जन्म 1600 ई मे एक हिन्दू कोली  परिवार मे, गोदोली ग्राम महाराष्ट्र मे हुआ था ओर इस वीर के पिता का नाम सरदार कालोजी था ओर तानाजी की माता का नाम पार्वती बाई था ओर तानाजी का पूरा नाम तानाजी मलसुरे था।तानाजी बचपन से ही शिवाजी के मित्र रहे ओर तानाजी मलसुरे ओर क्षत्रपति शिवाजी ये दोनों ही एक साथ होकर विपक्ष दल से युद्ध करते थे ओर शिवाजी ने तानजी की कुशलता देखी ओर तानजी को अपनी सेना मे सेनापती बना दिया ओर मराठा साम्राज्य का सूबेदार घोषित कर दिया तानाजी को प्रारम्भ से ही तलवार बाजी ओर सेनिक टुकड़ियों मे भाग लेना अधिक पसन्द था।

तानाजी मालसुरे

तानाजी एक वीर योद्धा के रूप मे जाने गए

तानाजी ओर शिवाजी बचपन से ही एक दूसरे के साथ रहे ओर ये दोनों अपने आप को भली प्रकार से जानते थे जब शिवाजी महाराज की माँ जीजाबाई अपने लाल महल से कोड़ाना किले को ओर देख रही थी तभी शिवाजी वह पर आए ओर अपनी माँ जीजाबाई से मन की बात पूछी तब जीजाबाई ने कहा की इस किले (कोड़ाना का किला ) पर लगा हरे रंग का झण्डा हमारे मन को छु रहा है बस इतना ही था की शिवाजी ने अपने भवन मे एक सैनिको की सभा बुलाई ओर कहा की कोड़ाना का किला कोण जीतकर लाएगा तो किसी भी सैनिक ने यह चुनोती स्वीकार नहीं की तब तानाजी मालसुरे कहा की कोड़ाना का किला मे जीतकर लाऊँगा इस प्रकार तानाजी ने अपनी बहदुरी का परिचय दिया ओर तानाजी मालसुरे ने कोड़ाना के किले को शिवाजी की माँ जीजाबाई के लिए जीतने का निश्चय कर लिया इस प्रकार तानाजी ने एक वीर योद्धा का परिचय दिया।

अनेक किताबें ओर किवन्दतियों मे कहा जाता है की जब तानाजी मालसुरे के पुत्र रायबा का विवाह की तैयारी हो रही थी तब तानाजी मालसुरे शिवाजी को विवाह का आमंत्रण देने के लिए राज महल गए तब तानाजी को पता चला की शिवाजी कोड़ाना के किले पर आक्रमण करने वाले है तब तानाजी ने कहा कि कोड़ाना के किले पर मे आक्रमण करूंगा ओर इस प्रकार तानाजी ने शिवाजी की इच्छा का मान रखा लिया ओर अपने पुत्र रायबा के विवाह को इतना महत्व नहीं दिया ।

कोड़ाना दुर्ग की मजबूती ओर तानजी की रणनीति

कोड़ाना के किला मजबूत बना हुआ था ओर यह कुछ इस तरह से बना हुआ था कि किले के भीतर प्रवेश करना मुसकिल ही नहीं नामुमकिन था लेकिन तानाजी मालसुरे अपनी रणनीति से किले के भीतर प्रवेश किया कोड़ाना के किले पर करीब 6000 मुगल सैनिकों का पहरा था इस समय इस किले की सुरक्षा उदय भान राठोर के हाथो मे थी उदय भान एक हिन्दू शासक थे जो कि पूरा देत्य था उदय भान के संबंध मे कहा जाता है कि 20 शैर चावल ओर 2 भैडे खा जाना मामूली बात थी।

कोड़ाना के किले का एक एसा भाग था जहा से किले के अंदर पहुच सकते थे वो भाग था किले की उची पहाड़ियो का पश्चिमी भाग, इस प्रकार तानाजी ने अपनी सेना के साथ यह तय किया कि वे किले की उची पहाड़ियो से होकर ही किले मे प्रवेश करेंगे ओर किले की सुरक्षा को भेदेगे।

शिवाजी kodana ka kila

कोड़ाना किले की लड़ाई ओर युद्ध का प्रारम्भ

फरवरी 1670 मे तानाजी मालसुरे के साथ ओर भाई सूर्याजी, ओर मामा शेलार 350 सैनिको के साथ कोड़ाना का किला जीतने के लिए निकल पड़े तानाजी राव एक वीर ओर शरीर से मजबूत थे ओर कोड़ाना का किला का राजनीतिक दृष्ठि से अधिक महत्व था ओर इस किले को जितना भी जरूरी था तानाजी ओर सैनिक टुकड़िया किले के पश्चिम भाग से अंदर प्रवेश करने का निश्चय कर लिया तानजी के पास एक गोरपद सरीसृप था गोरपद सरीसृप एक एसा जीव था अगर एक बार पत्थर पर अपने पाव जमा ले तो किसी भी तरह हिलता नहीं था ओर कई सैनिको भार झेल सकता था ओर इस गोरपद सरीसृप की मदद से तानाजी ओर सैनिक टुकड़िया किले के अंदर चुपचाप प्रवेश कर ली ओर मुगलों पर आक्रमण कर दिया।

कोड़ाना के किले की सुरक्षा का भार उदय भान के हाथो मे था जो राजकुमार जय सिंह-1 द्वारा नियुक्त था उदय भान के नेत्रत्व मे करीब 5000 मुगल सैनिक थे ओर इन मुगल सैनिक ओर तानाजी के बीच भयंकर युद्ध हुआ ओर इस युद्ध मे तानाजी वीरता से लड़े ओर अपनी बहादुरी का परिचय दिया तानाजी इस मे युद्ध मे लड़ते हुए गंभीर रूप से घायल हो गए ओर वीरगती को प्राप्त हो गए लेकिन तानाजी ने अपनी बहदुरी से कोड़ाना का किला ओर उसके आस पास के क्षेत्र को जीत लिया इस प्रकार तानाजी ने कोड़ाना के किले को मुगलो से मुक्त करा दिया।

जब शिवाजी ने यह सुना कि तानाजी ने कोड़ाना की किले पर अधिकार कर लिया ओर तानाजी लड़ते हुहे वीरगति को प्राप्त हो गए तब शिवाजी ने कहा गढ़ आला पण सिंह गेला अर्थात् “गढ़ तो हाथ में आया, परन्तु मेरा सिंह (तानाजी) चला गया।

तानजी एक एसे वीर योद्धा थे जिन्होने अपने पुत्र के विवाह ओर अपने परिवार की परवाह नहीं की ओर शिवाजी की आज्ञा का मान रखा ओर कोड़ाना के किले को जीतकर शिवाजी की इच्छा को पूरा किया।

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