अलाउद्दीन खिलजी ओर कान्हड देव जालोर युद्ध

By | February 8, 2020

जालोर अभियान को लेकर कान्हड देव ओर अलाउद्दीन खिलजी के मध्य युद्ध

जालोर का छोटा सा राज्य चौहानो का महत्व पूर्ण केंद्र रहा इस छोटे से राज्य की स्थापना कीर्तिपाल द्वारा की गयी थे ओर इस राज्य का अंतिम शासक कान्हड देव था ओर राजस्थान के इतिहास मे इस छोटे से राज्य ने महत्व पूर्ण भूमिका निभाई। अलाउद्दीन खिलजी ओर कन्हाड देव का जालोर का युद्ध राजस्थान के इतिहास मे महत्वपूर्ण स्थान रखता है

अलाउद्दीन खिलजी से पहले दिल्ली ओर जालोर के शासको के बीच सम्बंध

उदय सिंह ओर दिल्ली सुल्तान :- उदय सिंह एक वीर योद्धा था उदय सिंह के पिता का नाम अमर सिंह था ओर उदय सिंह सन 1205 मे जालोर की गद्दी पर बेठा इस समय दिल्ली का सुल्तान इल्तुतमिश था जालोर की बड़ती हुई शक्ति से इल्तुतमिश बड़ा चिंतित हुआ बस क्या था इल्तुत मिश ने जालोर पर आक्रमण करने का निश्चय किया ओर 1228 मे इल्तुत मिश ने जालोर पर आक्रमण कर दिया इस युद्ध मे उदय सिंह की पराजय हुई ओर कहा जाता है की उदय सिंह ने इल्तुत मिश को वार्षिक कर देने का वचन दिया इस कर के बदले जालोर उदय सिंह को वापस लोटा दिया लेकिन इल्तुत मिश जालोर पर पूर्ण रूप से अधिकार नहीं कर सका।

ग्रंथो के अनुसार कहा जाता है की करीब 1254 मे उदय सिंह पर दिल्ली सुल्तान नासिरुद्दीन महमूद ने आक्रमण कीया था लेकिन इस युद्ध मे नासिरुद्दीन को पराजय का मुह देखना पड़ा ओर इस प्रकार 1257 तक उदय सिंह ने जालोर की स्वतन्त्रता को बनाए रखा ।

उदय सिंह के बाद, उतराधिकारी ओर दिल्ली सुल्तान :- जब उदय सिंह की मृत्यु हो गई तो मृत्यु के बाद उदय सिंह का पुत्र चाचिगदेव 1257 मे जालोर की गद्दी पर बेठा ओर शासन की बाग डोर अपने हाथ मे संभाली लेकिन चाचिग देव को दिल्ली के किसी भी सुल्तान के साथ आक्रमण नहीं करना पड़ा ओर चाचिग देव की मृत्यु 1282 मे हो गई ओर इसके बाद चाचिग देव का पुत्र सामन्तसिंह जालोर की गद्दी पर बेठा गद्दी पर बेठने के बाद इसी बीच 1291 मे दिल्ली सुल्तान जलालूद्दीन खिलजी की सेना सांचोर तक आ गई थी लेकिन सामन्तसिंह ने सांगरदेव की सहायता से सुल्तान की सेना को लोटने के लिए बाध्य कर दिया समय अनुसार 1296 मे अलाउद्दीन खिलजी दिल्ली सल्तनत का सुल्तान बना ।

इधर जालोर का शासक सामन्त सिंह भी समय को पहचान कर अपनी शासन की बागडोर अपने पुत्र कान्हड देव को सोप दी कान्हड देव एक वीर योद्धा था ओर लम्बे समय तक अलाउद्दीन खिलजी का सामना किया लेकिन कान्हड देव को आखिर मे पराजय होना पड़ा ।

अलाउद्दीन खिलजी ओर कान्हड देव

कान्हड देव एक वीर योद्धा था ओर वह अलाउद्दीन खिलजी की अधीनता स्वीकार नहीं कर रहा था कान्हड देव का कर्तव्य था की वो जालोर का मान सम्मान बनाए रखे कान्हड ने अलाउद्दीन खिलजी की अधीनता स्वीकार नहीं की जिसके लिए अलाउद्दीन खिलजी ने युद्ध का सहारा लिया । दूसरी ओर जालोर का दुर्ग अधिक मजबूत था खिलजी एसे दुर्गो पर अधिकार करके अपनी स्थिति को बनाए रखना चाहता था। ओर मालवा ओर गुजरात को जीतने के लिए भी जालोर पर अधिकार करना आवश्यक था ।

कहा जाता है की जब दिल्ली शाही सेना गुजरात अभियान से वापस लोट रही थी तब कान्हड देव ने अलाउद्दीन खिलजी की किसी प्रकार से सहायता नहीं की ओर बल्कि कान्हड देव ने शाही सेना पर आक्रमण किया जिससे अलाउद्दीन खिलजी अधिक नाराज हो गए अलाउद्दीन खिलजी सिकंदर के समान बनाना चाहता था ओर वह सम्पूर्ण भारत पर अपना अधिकार करना चाहता था ।

कहा जाता है की अलाउद्दीन खिलजी विश्व विजय का सपना देखा करता था ओर वह सम्पूर्ण भारत पर अधिपत्य करना चाहता था अलाउद्दीन खिलजी सबसे पहले गुजरात अभियान की तैयारी की ओर खिलजी ने कान्हड देव के पास सूचना भिजवाई की शाही सेना को ( अलाउद्दीन खिलजी की सेना ) जालोर की सीमा से गुजरने दे लेकिन कान्हड देव ने खिलजी के इस आदेश का पालन नहीं किया जिससे खिलजी को बड़ा दुख हुआ ओर युद्ध की स्थिति उत्पन्न हो गई दोनों मे युद्ध होना स्वाभाविक था अलाउद्दीन खिलजी हिन्दू धर्म का कट्टर शत्रु था हिन्दुओ के प्रति खिलजी का अपमानजनक वेवहार था दूसरी ओर कान्हड देव हिन्दू धर्म का रक्षक ओर संकृति को बनाए रखने के लिए कटिबद्ध था इस तरह दोनों पक्षो मे युद्ध होना स्वाभाविक था ।

कान्हड देव ओर अलाउद्दीन खिलजी के बीच युद्ध

कहा जाता है की जब अलाउद्दीन खिलजी गुजरात अभीयान से वापस लोट रहा था तब कान्हड देव ने अपने एक मंत्री को जिसका नाम जैता देवड़ा को उलुग खा के पास भेजा जिससे यहा मालूम हुआ की उलुग खा ओर नुसरत खा के साथ सोमनाथ की मूर्ति थी जो की पाँच टुकड़ो मे बटी हुई थी जो इस सोमनाथ की मूर्ति को दिल्ली शाही दरबार मे मुसलमानो के पावो से कुचलने के लिए ले जा रहे है ।

jalor abhiyan,सिवाना दुर्ग

इस प्रकार कान्हड देव ने सोमनाथ की मूर्ति को बचाने के लिए अलाउद्दीन खिलजी की सेना पर आक्रमण कर दिया ओर दोनों पक्षो मे भयंकर युद्ध हुआ जिसमे कान्हड देव की विजय हुई कान्हड देव की प्रतिष्ठा मे वृद्दि हुई इसके विपरीत अलाउद्दीन खिलजी को पराजय से काफी धक्का लगा ओर अलाउद्दीन खिलजी 5 वर्ष तक चुप्पी लगकर बेठ गया ।

5 वर्ष चुप्पी लगाने के बाद अलाउद्दीन खिलजी 1305 मे एक अपने सेनापति एनुल्मुल्क को एक विशाल सेना के साथ जालोर पर आक्रमण करने के लिए भेजा एनुल्मुल्क ने कान्हड देव को गौरवपूर्ण संधि का आश्वासन देकर दिल्ली ले आया शाही दरबार मे कान्हड देव को उचित सम्मान नहीं मिला ओर शाही दरबार मे खिलजी ने कहा की कोई भी हिन्दू शासक उसकी शक्ति के सामने टिक नहीं सकते इस पर कान्हड देव ने सुल्तान को अपने विरुद्ध लड़ने की चुनोती दी ओर स्वयम जालोर लोट आया ओर युद्ध की तैयारी मे लग गए ।

अलाउद्दीन खिलजी द्वारा सिवाना पर आक्रमण करना

अपनी शक्ति मजबूत करके खिलजी ने जालोर पर आक्रमण करने से पहले सिवाना पर अधिकार करना उचित समझा खिलजी ने सिवाना को जीतने के लिए हर तरह से संभव किया लेकिन सिवाना पर अधिकार नहीं कर सका खिलजी ने कूटनीति का सहारा लिया ओर खिलजी ने एक गद्दार राजपूत को अपनी ओर मिला लिया ओर सिवाना तालाब के पनि को अशुद्ध करवा दिया जिससे खाद्य ओर पीने के पानी की कमी हो गई ओर राजपूतो ने केसरिया सफा पहनकर दुर्ग के द्वार खोल दिये ओर युद्ध मे मेदान मे आ गए इस मेदान मे अलाउद्दीन खिलजी को सफलता प्राप्त हुई ओर राजपूत स्त्रियो ने जौहर का रास्ता अपनाया अलाउद्दीन ने इस दुर्ग का नाम बदलकर खेराबाद कर दिया ।

जालोर विजय

सिवाना दुर्ग पर अधिकार करने के बाद खिलजी के लिए जालोर दुर्ग पर अधिकार करना आसान हो गया खिलजी के सेनानायक मालिक नाइब ने आगे बढकर जालोर दुर्ग का घेरा डाल दिया इसके विपरीत वीरम देव ओर मालदेव शाही सेना के सभी प्रयासो को विफल कर दिया इस स्थिति मे कान्हड देव के एक राजपूत सरदार बीका शत्रुओ की सहायत से जालोर दुर्ग का स्वामी बनाना चाहता था सरदार बीका ने कान्हड देव दे साथ विश्वास घात किया सरदार बीका ने खिलजी के प्रलोभनों मे फस गया ओर कान्हड देव का साथ छोड़कर शाही सेना मे आ गया।

कहा जाता है की सरदार बीका ने शाही सेना को जालोर दुर्ग मे घुसने का एकदम सुरक्षित मार्ग बता दिया जिससे शाही सेना ने जालोर दुर्ग पर आक्रमण कर दिया ओर राजपूतो ने शाही सेना का डटकर मुक़ाबला किया ओर हजारो राजपूत वीरगति को प्राप्त हुये ओर कान्हड देव भी लड़ते लड़ते वीर गति को प्राप्त हो है ओर इस प्रकार जालोर पर अलाउद्दीन खिलजी का अधिकार हो गया ।

 

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