राजस्थान के इतिहास मे चित्तौड़ का किला । History of Chittorgarh Fort in Hindi

By | May 17, 2020

चित्तौड़ का किला History of Chittorgarh Fort

चित्तौड़ का किला राजस्थान के इतिहास मे ही नहीं बल्कि भारत के इतिहस मे अपनी सामरिक द्रष्टि मे अधिक महत्व रखता है। चित्तौड़ का किला राजस्थान मे क्षेत्रफल की द्रष्टि से सबसे बड़ा दुर्ग है।

चित्तौड़ का किला राजस्थान मे अजमेर खंडवा रेलमार्ग पर स्थित चित्तौड़गढ़ रेल्वे स्टेशन से करीब 2 मील उची पहाड़ी पर मेवाड़ राज्य का प्रसिद दुर्ग बना हुआ है ।जिसे चित्रकूट के नाम से भी जाना जाता है यह दुर्ग मेवाड़ मे वीरों ओर बलिदान की भावनाओ का प्रतीक है।

राजस्थान के इतिहास मे चित्तौड़ का किला । History of Chittorgarh Fort in Hindi

चित्तौड़ का किला समुन्द्र की सतह से लगभग 1850 फीट उचा है यह दुर्ग 3 मील लंबा ओर आधा मील चौड़ा है इस दुर्ग मे खेती योग्य भूमि है ओर जलाशय भी है चित्तौड़ के दुर्ग मे बस्तिया ओर मंदिर है ।

स्पष्ट रूप से यह नहीं कहा जा सकता कि चित्तौड़ का किला का निर्माण किसने करवाया था चित्तौड़ का किला का निर्माण लगभग 8 वी शताब्दी के प्रारम्भ मे यह दुर्ग मोरीवंशी राजा भीम के अधिकार मे था।

इस भीम का उत्तराधिकार माना हुआ, जिसे चित्रगमोरी भी कहते है ओर इसी के नाम से यह दुर्ग चित्रकूट कहलाया बाद मे यह दुर्ग गुहिल राजवंश के अधिकार मे आ गया था ।

चित्तौड़ का किला की मजबूती  

चित्तौड़ का किला मजबूत दीवारों से बना हुआ है ओर सम्पूर्ण किला चारो तरफ दीवारों घीरा हुआ है इस किले की सुरक्षा के लिए मुख्य मार्ग तथा सात द्वार बने हुए है।

महाराणा कुंभा ने सुरक्षा की द्रष्टि से इस किले को मजबूत प्राचीरों से युक्त बनाया ओर सम्पूर्ण प्राचीरों ओर द्वारो को आवश्यकतानुसार परिवर्तन कर के नए तरीकों से बनवाया कीर्तिस्तभा प्रशस्थि मे रामपोल, भैरवपोल, हनुमान पोल, चामुंडा पोल, तारापोल, लक्ष्मीपोल, आदि का विस्तारित वर्णन मिलता है। 

इस किले पर जाने के लिए मार्ग का निर्माण भी महाराणा कुंम्भा ने करवाया था प्रथम द्वार पांडनपोल के बाहर एक वर्गाकार चबूतरे पर प्रतापगढ़ के रावत बाघसिंह का स्मारक बना हुआ है जो 1534 ई मे गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह के आक्रमण के समय दुर्ग की रक्षा करते हुए इसी पांडनपोल के पास मारा गया था ।

इसके आगे बढने पर भैरवपोल आता है जहा कल्ला ओर वीर जयमल राठौड़ की छतरिया बनी हुई है। ये दोनों वीर 1567 ई मे अकबर के आक्रमण के समय दुर्ग की रक्षा करते हुई वीर गति को प्राप्त हुए थे।

इन छतरियो के आगे बढने पर गणेशपोल, लक्ष्मणपोल, ओर जोड़नपोल आते है इन सभी पोलो को मजबूत दीवारों से जोड़ा गया है की बिना इन द्वारो को तोड़े दुर्ग मे प्रवेश करना करीब असंभव है इस स्थल की उचाई मजबूत दीवारों का घुमाव ओर मार्ग का सकरापन दुर्ग की सुरक्षा के अच्छे साधन है ।

इसके आगे रामपोल से दुर्ग की समतल स्थित आरंभ होती है रामपोल के एक तरफ पत्ता सीसोदिया का स्मारक दिखाई देता है जो अकबर के आक्रमण के समय लड़ता हुआ यही मारा गया था इसके आगे बढने पर दाहिनी ओर तुलजा माता का मंदिर भी बना हुआ है।

इसके थोड़ा आगे बढने पर बनवीर द्वारा निर्मित नवलख भंडार तोफखाने दालाना महासानी ओर पुरोहितों की हवेलिया भामाशाहा की हवेलिया ओर श्रंगार चवरी का मंदिर आता है मंदिर के चारों तरफ तक्षण काला का सुंदर ढग से प्रदर्शन किया गया है ।

राजस्थान के इतिहास मे चित्तौड़ का किला । History of Chittorgarh Fort in Hindi

आगे बड़ने पर त्रिपोलिया नामक द्वार आता है जहा पास मे ही कुंभा के दर्शनीय महल है ये महल बहुत प्राचीन है ! इन महलों को कुंभा ने नया नाम रूप दिया इन महलो मे राजमहलों का चौक बणमाता का मंदिर ओर कुंभा के जनना तथा मर्दाना महल राजकुमार के महल ओर सभा भवन आदि बने हुए है इसके बाद मे दो बुर्ज ओर एक खुला मैदान आता है जहा पर हाथी खाना बना हुआ है ।

कुंभा के महलों के आगे कुम्भश्याम का मंदिर आता है छठी सदी का है महाराणा कुंभा ने इसका जीर्णोंउद्दार करवाया था मंदिर के उतरंग भाग पर सुंदर नक्काशी की हुई है।

मंदिर के बाहरी भाग मे मूर्तिया उत्कीर्ण की हुई है ओर इसके पास ही दो मंदिर है इन मंदिर मे एक मीरा बाई का मंदिर कहा जाता है ओर दूसरा जैन मंदिर है इस जैन मंदिर मे गुजरात की तक्षण कला स्पष्ट झलकती है।

इसके आगे बढने पर गौमुख कुंड ओर उसके पास त्रिभुवन नारायण का मंदिर आता है और इस मंदिर का निर्माण मालवा के प्रसिद्ध राजाभोज ने 11 वीं शताब्दी में करवाया था। और इसे त्रिभुवन नारायण का शिवालय और भोज का मंदिर भी कहा जाता था। यहा मंदिर 13 वी शताब्दी की स्थापत्य कला की सुंदर झांकी प्रस्तुत करता है इस मंदिर के पास नौ मंज़िला का विशाल कीर्तिस्तंभ है ।

कीर्तिस्तंभ के आगे बढने पर जयमल राठोड की हवेली मिलती है जिसमे बने हुए कमरे बरामदे आती हिन्दू स्थापत्य कला के श्रेष्ठ उदाहरण है लेकिन सीधे व साधे स्तम्भ तथा सपाट छतों मे मुस्लिम शैली दिखाई देती है ।

हवेली के आगे पद्मिनी महल ओर कालिका मंदिर आता है जो पहले सूर्य मंदिर था यहा से दुर्ग के एक छोर पर पहुँच जाते थे जहा से वापस मुड़कर दाहिनी ओर रास्ते पर आगे बड्ने पर एक जैन विजय स्तम्भ आता है।

इस विजय स्तम्भ की तक्षण कला गुजरात की जैन तक्षण कला के अनुरूप दिखाई देती है इस मार्ग पर अदभूतजी लक्ष्मी जी का मंदिर नीलकंट का मंदिर अन्नपूर्णा ओर लक्ष्मी का  मंदिर कुकड़ेश्वर मंदिर ओर कुंड रत्न सिंह के महल आदि दर्शनीय स्थल है इन महलो ओर मंदिरो मे पश्चिमी भारतीय स्थापत्य शैली दिखाई देती है जो मुस्लिम स्थापत्य शैली से प्रभावित थी ।

इस प्रकार यह चित्तौड़ का गिरि दुर्ग अपने आप मे एक पूर्ण इकाई है 1303 ई के पूर्व वर्तमान चित्तौड़ का कस्बा नहीं था सभी लोग किले के भीतर रहते थे परंतु किले पर मुसलमानो का अधिकार हो जाने के बाद लोगो ने किले की तलहटी मे बसना शुरू कर दिया था इसे राजस्थान का दक्षिणी पूर्वी द्वार भी कहा जाता है।

चित्तौड़ का किला मालवा ओर गुजरात के मार्ग मे पड़ता था इसलिए इसका सामरिक महत्व भी अधिक था यहा के खंडर रजपूती वीरांगनाओ के जौहर की धधकती हुई ज्वाला के साक्षी है ओर चित्तौड़ दुर्ग की रेणुका भारतीयो के तीर्थ स्थल की मिट्टी से भी अधिक पवित्र है।

अपनी एतिहासिक परम्पराओ के कारण राजस्थान मे ही नहीं समस्त भारत मे यहा दुर्ग एक अपना अलग स्थान रखता है । इस चित्तौड़ का किला पर घूमने के लिए देश विदेशो से लोग यहा पर आते है।

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