ईसा मसीह का जीवन । कौन थे ईसा मसीह जाने सब कुछ

By | May 19, 2020

क्रिसमस जिसे सम्पूर्ण विश्व में मनाया जाने वाला पर्व है। इसे बड़ा दिन के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व ईसा मसीह के के जन्म की खुशी में मनाया जाने वाला पर्व है। ईसा मसीह को यीशु के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व (क्रिसमस) 25 दिसम्बर को मनाया जाता है और इस दिन लगभग संपूर्ण विश्व मे अवकाश रहता है।

History of isa Masih in Hindi

ईसा मसीह का जीवन । क्रिसमस क्यों मनाया जाता है ? ईसा मसीह का जन्म,यीशु मसीह की कहानी,christmas day history hindi,यीशु मसीह का जन्म

ईसा मसीह का जीवन । क्रिसमस क्यों मनाया जाता है ? ईसा मसीह का जन्म,यीशु मसीह की कहानी,christmas day history hindi,यीशु मसीह का जन्म

क्रिसमस से 12 दिन के उत्सव क्रिसमसटाइड की भी शुरुआत होती है। ईसा मसीह का जन्म एन्नो डोमिनी काल प्रणाली के आधार पर 7 से 2 ई॰ के बीच माना जाता है। मुख्यत: 25 दिसम्बर ईसा मसीह के जन्म की कोई वास्तविक ज्ञात तिथि नहीं है। बताया गया है कि इस तिथि को रोमन पर्व या मकर सक्रांति से संबंध स्थापित करने के आधार पर चुना गया है।

आधुनिक क्रिसमस की छुट्टियों मे एक दूसरे को उमंग और उल्लास के साथ उपहार देना, चर्च मे समारोह और कई सजावटें करना शामिल है। इस सजावट मे क्रिसमस  का पेड़, रंग बिरंगी रोशनियां, बंडा, जन्म की झाँकी आदि शामिल है।

सांता क्लॉज (जिसे क्रिसमस का पिता कहा जाता है हालाँकि, दोनों का मूल भिन्न है) जिसे अक्सर क्रिसमस पर बच्चों के लिए तोफे लाने के साथ जोड़ा गया है। सांता के आधुनिक स्वरूप के लिए मीडिया मुख्य रूप से उत्तरदायी है।

क्रिसमस को सभी ईसाई धर्म के लोग मनाते हैं और आजकल इसे कई लोग एक धर्मनिरपेक्ष, सांस्कृतिक उत्सव के रूप मे मनाते हैं। क्रिसमस के उत्सव पर उपहारों एसजे आदान प्रदान तथा सजावट और छुट्टी के दौरान मौजमस्ती के कारण यह एक बड़ी आर्थिक गतिविधि बन गया है।

विश्व भर के अधिकतर देशों में यह 25 दिसम्बर को मनाया जाता है। क्रिसमस की पूर्व संध्या अर्थात 24 दिसम्बर को ही जर्मनी और कुछ देशों में इससे जुड़े समारोह शुरु हो जाते हैं। ब्रिटेन और अन्य राष्ट्रमंडल देशों में क्रिसमस से अगला दिन अर्थात 26 दिसम्बर को बोक्सिंग-डे के रूप मे मनाया जाता है।

कुछ देशों में इसे सेंट स्टीफेंस डे या फीस्ट ऑफ़ सेंट स्टीफेंस भी कहते हैं। आर्मीनियाई अपोस्टोलिक चर्च 6 जनवरी को क्रिसमस मनाता है पूर्वी परंपरागत गिरिजा जो जुलियन कैलेंडर को मानता है वो जुलियन वेर्सिओं के अनुसार 25 दिसम्बर को क्रिसमस मनाता है, जो ज्यादा काम में आने वाले ग्रेगोरियन कलेंडर में 7 जनवरी का दिन होता है क्योंकि इन दोनों कैलेंडरों में 13 दिनों का अन्तर होता है।

क्रिसमस ईसा मसीह के जन्म की खुशी ममें मनाया जाने वाला पर्व है। यह 25 दिसम्बर को मनाया जाता है और इस दिन लगभग सम्पूर्ण विश्व में अवकाश रहता है। क्रिसमस से 12 दिन के उत्सव क्रिसमसटाइड की भी शुरुआत होती है।

एन्नो डोमिनी काल प्रणाली के आधार पर यीशु का जन्म 7 से 2 ई॰पू॰ के बीच हुआ था। 25 दिसम्बर ईसा मसीह के जन्म की कोई ज्ञात तिथि नहीं है और लगता है कि इस तिथि को एक रोमन पर्व या मकर सक्रांति से संबंध स्थापित करने के आधार पर चुना गया है। आधुनिक क्रिसमस कि छुट्टियों में एक दूसरे को उपहार देना, चर्च में समारोह और विभिन्न सजावट करना शामिल हैं।

इस सजावट में क्रिसमस का पेड़, रंग बिरंगी रोशनियां, बंडा, जन्म कि झांकी आदि शामिल है। सांता कलॉज (जिसे क्रिसमस का पिता कहा जाता है हालांकि दोनों का मूल भिन्न है) क्रिसमस से जुड़ी एक लोकप्रिय पौराणिक परंतु कल्पित शख्सियत है जिसे अक्सर क्रिसमस पर बच्चों के लिए तोहफे लाने के साथ जोड़ा जाता है। सांता के आधुनिक स्वरूप के लिए मीडिया मुख्य रूप से उत्तरदायी है।

क्रिसमस को सभी ईसाई लोग मानते हैं और आजकल तो कई गैर ईसाई लोग भी इसे धर्मनिरपेक्ष, सांस्कृतिक उत्सव के रूप में मानते हैं। क्रिसमस के दौरान उपहारों का आदान प्रदान, सजावट का सामान और छुट्टी के दौरान मौज मस्ती के कारण यह एक बड़ी आर्थिक गतिविधि बन गया है और अधिकांश खुदरा विक्रेताओं के लिए इसका आना एक बड़ी घटना है।

दुनिया भर के अधिकतर देशों में यह 25 दिसम्बर को मनाया जाता है। क्रिसमस कि पूर्व संध्या अर्थात 24 दिसम्बर को ही जर्मनी तथा कुछ अन्य देशों में इससे जुड़े समारोह शुरू हो जाते हैं। ब्रिटेन और अन्य देशों में क्रिसमस से अगला दिन यानि 26 दिसम्बर को बोक्सिंग-डे के रूप में मनाया जाता है।

कुछ कैथोलिक देशों में इसे सेंट स्टीफेंस-डे या फीस्ट ऑफ सेंट स्टीफेंस भी कहते हैं। आर्मीनियाई अपोस्टोलिक चर्च 6 जनवरी को क्रिसमस मनाता है पूर्वी परंपरागत गिरिजा जो जुलियन कैलेंडर को मानता है वो जुलियन वेर्सिओं के अनुसार 25 दिसम्बर को क्रिसमस मनाता है, जो ज्यादा काम में आने वाले ग्रेगोरियन कैलेंडर में 7 जनवरी का दिन होता है क्योंकि इन दोनों कैलेंडर में 13 दिनों क अन्तर होता है। 

व्युत्पत्ति विज्ञान

क्रिसमस को अलग अलग देशों में अलग अलग नाम से जाना जाता है। भारत और पड़ोसी देशों में इसे बड़ा दिन तथा महत्वपूर्ण दिन कहा जाता है।  माना जाता है कि 25 दिसम्बर से दिन बड़े होने लगते हैं इसलिए शायद इसे बड़ा दिन कहा जाने लगा हो।

ईसाई धर्म के यीशु (Nativity Of Jesus ) के बारे मे ये मान्यता है की “मसीहा” (Messiah) मरियम (Virgin Mary) के पुत्र के रूप में पैदा हुआ क्रिसमस की कहानी मैथ्यू की धर्म शिक्षा (गोस्पेल ऑफ मैथ्यू) (Gospel Matthew) मे दिए गए बाइबल खातों पर आधारित है, और दी ल्यूक की धर्म शिक्षा (गोस्पेल ऑफ लुके) (Gospel Of Luke) विशेषकर इसके अनुसार येशु मरियम को उनके पति सेंट जोसेफ की मदद से बेतलेहेम में प्राप्त हुए थे।

लोकप्रिय परम्परा के अनुसार इनका जन्म एक अस्तबल में हुआ था जो हर तरफ से जानवरों से घिरा था। हालांकि न तो अस्तबल और न ही जानवरों का बाइबल में कोई जिक्र है हालांकि एक “व्यवस्थापक” ल्यूक 2:7 में उल्लेखित है जहां यह कहा गया है कि “वह कपड़ों में लिपटा हुआ और उसे एक चरनी में उसे रखा, क्योंकि वहाँ के सराय में उनके लिए कोई जगह नहीं थी।“  पुरानी प्रतिमा विज्ञान ने, स्थिर और चरनी एक गुफा के भीतर स्थिर थे, की पुस्टी की (जो अभी भी चर्च बेतलेहेम में ईसाइयों के तहत मौजूद है) है।

वहाँ के जानवरों को येशु के जन्म के बारे में फ़रिश्ताने बताया था अत: उन्होने बच्चे को सबसे पहले देखा ईसाइयों का मानना है कि येशु के जन्म के बारे में यह कहा जाता है कि यह क्रिसमस सेंट जॉर्ज अराजकता को माना जाता था और अराजकता को सूर्य की दिव्यता और चंद्रमा ईथर को बनाने के लिए शाश्वत वापसी के हलको का चक्र है ड्रेगन बच्चे का पारिवारिक अवकाश बन गया था वुमन और बच्चे और एंड्रोजेनपी-आर्कटाइप ने इनके जन से 700 साल पहले की गई भविष्यवाणी को सच कर दिया।

क्रिसमस को अलग अलग देशों मे अलग अलग नाम से पुकारा जाता है, भारत और इसके पड़ोसी देशों मे इसे बड़ा दिन कहा जाता है। जो कि एक महत्वपूर्ण दिन माना जाता है। किसी देश पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिये सबसे अच्छा तरीका है कि वहां की संस्कृति, धर्म, सभ्यता पर अपनी संस्कृति, सभ्यता और धर्म को कायम करो।

जैसे 210 साल पहले अंग्रेजों ने भारत में अपनी पकड़ मजबूत कर ली थी। यह वह समय था जब ईसाई धर्म फैलाने की आवश्यकता थी और अंग्रेज यह करना भी चाहते थे। उस समय 25 दिसम्बर वह दिन था, जबसे दिन बड़े होने लगते थे। हिन्दुओं में इसके महत्व को भी नहीं नकारा जा सकता था। शायद इसी लिये इसे बड़ा दिन कहा जाने लगा ताकि हिन्दू इसे आसानी से स्वीकार कर लें।

ईसा मसीह

ईसा मसीह जिन्हें नासरत का यीशु भी कहा जाता है, जो ईसाई धर्म के प्रवर्तक हैं। ईसाई लोग उन्हें परमपिता परमेश्वर का पुत्र और ईसाई त्रिएक परमेश्वर का तृतीय सदस्य मानते हैं।

ईसा की जीवनी और उपदेश बाइबल के नये नियम (खास तौर पर चार शुभसन्देशों : मत्ती, लूका, यूहन्ना, मर्कुस पौलुस का पत्रिया, पत्रस का चिट्ठियां, दुनिया के अंत में होने वाली चीजों का विवरण देने वाली प्रकाशित वाक्य) में दिये गए हैं।

ईसा मसीह को इस्लाम में ईसा कहा जाता है तथा उन्हें इस्लाम के भी महानतम पैगम्बरों में से एक माना जाता है। उन्हें इस्लामी परम्परा में भी एक महत्वपूर्ण पैगम्बर माना गया है और कुरान में उनका ज़िक्र है।

[ ईसा मसीह का जन्म और बचपन  History of isa Masih in Hindi ]

ईसा मसीह का जीवन । क्रिसमस क्यों मनाया जाता है ? ईसा मसीह का जन्म,यीशु मसीह की कहानी,christmas day history hindi,यीशु मसीह का जन्म,ईसा मसीह का जन्म और बचपन

ईसा मसीह का जीवन । क्रिसमस क्यों मनाया जाता है ? ईसा मसीह का जन्म,यीशु मसीह की कहानी,christmas day history hindi,यीशु मसीह का जन्म,ईसा मसीह का जन्म और बचपन

बाइबल के अनुसार ईसा मसीह की माता मरियम गलीलिया प्रांत के नाजरेथ गाँव की रहने वाली थी। उनकी सगाई दाऊद के राजवंशी यूसुफ नामक बढ़ई व्यक्ति से हुई थी। विवाह के पहले ही वह कुँवारी रहते हुए ही ईश्वरीय प्रभाव से गर्भवती हो गई। ईश्वर की ओर से संकेत पाकर यूसुफ ने उन्हें पत्नीस्वरूप ग्रहण किया।

इस प्रकार जनता ईसा की अलौकिक उत्पत्ति से अनभिज्ञ रही। विवाह सम्पन्न होने के बाद यूसुफ गलीलिया छोड़कर यहूदिया प्रांत के बेथलेहेम नामक नगरी में परिवार सहित जाकर रहने लगे, वहाँ ईसा मसीह का जन्म हुआ। शिशु को राजा हेरोद के अत्याचार से बचाने के लिए यूसुफ मिस्र भाग गए। उसके बाद हेरोद 4 ई॰ पू॰ में चल बसे।

अत: ईसा का जन्म संभवत: 4 ई॰ पू॰ में हुआ था। हेरोद के मरण के बाद यूसुफ लौटकर नजरेथ गाँव में बस गए। ईसा मसीह जब 12 वर्ष के हुए तो यरूशलम में तीन दिन रूककर मन्दिर में उपदेशकों के बीच में बैठे, उन की सुनते और उन से प्रश्न करते हुए पाया।

लूका 2:47 और जिन्होंनें उन को सुना वे सब उनकी समझ और उनके उत्तरों से चकित थे। तब ईसा मसीह अपने माता-पिता के साथ अपने गाँव वापिस लौट गए। ईसा मसीह ने यूसुफ का पेसा सीख लिया और लगभग 30 साल की उम्र तक उसी गाँव में रहकर वे बढ़ई का काम करते रहे।

बाइबल (इंजील) में उनके 13 से 29 वर्षों के बीच का कोई ज़िक्र नहीं मिलता। 30 वर्ष की उम्र में उनहोंनें यूहन्ना (जॉन) से पानी में डुबकी (दीक्षा) ली। दीक्षा के बाद ईसा पर पवित्र आत्मा आई। 40 दिन के उपवास के बाद ईसा मसीह लोगों को शिक्षा देने लगे।

[ बैबलियाई आत्मकथा ]

[ जन्म ]

History of isa Masih in Hindi हेरोदेस राजा के दिनों में जब यहूदिया के बैतलहम में यीशु का जन्म हुआ, तो देखो, पूर्व से कई ज्योतिषी यरूशलेम में आकर पूछने लगे कि यहूदियों को राजा जिसका जन्म हुआ है, कहाँ है? क्योंकि हम ने पूर्व में उसका तारा देखा है और उस को प्रणाम करने आए हैं।

यह सुनकर हेरोदेस राजा और उसके साथ सारा यरूशलेम घबरा गया और उसने लोगों के सब महायाजकों और शास्त्रियों को इकट्ठे करके उन से पूछा कि ईसा मसीह का जन्म कहाँ होना चाहिए? उन्होनें उस से कहा, यहूदिया के बैतलहम में; क्योंकि भविष्यद्वक्ता के द्वारा यों लिखा है कि हे बैतलहम, जो यहूदा के देश में है, तू किसी रीति से यहूदा के अधिकारियों में सबसे छोटा नहीं; क्योंकि तुझ में से एक अधिपति निकलेगा, जो मेरी प्रजा इस्राएल कि रखवाली करेगा।

तब हेरोदेस ने ज्योतिषियों को चुपके से बुलाकर उन से पूछा, कि तारा ठीक किस समय दिखाई दिया था और उस ने यह कहकर उन्हें बैतलहम भेजा कि जाकर उस बालक के विषय में ठीक ठीक जानकारी मालूम करो और जब वह मिल जाए तो मुझे समाचार दो ताकि मैं भी आकर उस को प्रणाम करू। वे राजा की बात सुनकर चले गए और देखो, जो तारा उन्होंने पूर्व में देखा था, वह उन के आगे आगे चला और जहां बालक था, उस जगह के ऊपर पहुँचकर ठहर गया।

उस तारे को देखकर वे अति खुश और प्रसन्न हुए और उस घर में पहुँचकर उस बालक को उसकी माता मरियम के साथ देखा और मुँह के बल गिरकर उन्हें प्रणाम किया और अपना अपना थैला खोलकर उसे सोने और लोहबान और गंधरस की भेंट चढ़ाई और स्वप्न में यह चितौनी पाकर कि हेरोदेस के पास फिर न जाना, वे दूसरे मार्ग से होकर अपने देश को चले गए।

उन के चले जाने के बाद देखो, प्रभु के एक दूत ने स्वप्न में यूसुफ को दिखाई देकर कहा, उठ; उस बालक और उसकी माता को लेकर मिस्र देश को भाग जा, और जब तक मैं तुझसे न कहूँ तब तक वहीं रहना, क्योंकि हेरोदेस इस बालक को ढूँढने पर है कि उसे मरवा डाले।

वह रात को ही उठकर बालक और उसकी माता को लेकर मिस्र को चल दिये। हेरोदेस के मरने तक वहीं रहा इसलिये कि वह वचन जो प्रभु ने भविष्यद्वक्ता के द्वारा कहा था कि मैंने अपने पुत्र को मिस्र से बुलाया। जब हेरोदेस ने यह देखा कि ज्योतिषियों ने मेरे साथ ठट्ठा किया है,

तब वह क्रोध से भर गया और लोगों को भेजकर ज्योतिषियों से ठीक ठीक पूछे हुए समय के अनुसार बैतल हम और उसके आस पास के सब लड़कों को जो दो वर्ष के तथा उससे छोटे थे, मरवा डाला। तब जो वचन भविष्यद्वक्ता के द्वारा कहा गया था, वह पूरा हुआ, कि रामाह में एक करूण-नाद सुनाई दिया, रोना और बड़ा विलाप, राहेल अपने बालकों के लिये रो रही थी और शान्त होना य चाहती थी, क्योंकि वे हैं नहीं।

हेरोदेस के मरने के बाद देखो, प्रभु के दूत ने मिस्र में यूसुफ को स्वप्न में दिखाई देकर कहा कि उठ, बालक और उस कि माता को लेकर इस्राएल के देश में चला जा; क्योंकि जो बालक के प्राण लेना चाहता थे वे मर चुके हैं।

वह उठा और बालक और उसकी माता को लेकर इस्राएल के देश में आया। परन्तु यह सुनकर कि अरिखलाउस अपने पिता हेरोदेस कि जगह यहूदिया पर राज्य कर रहा है, वहाँ जाने से डरा और स्वप्न में चैतावनी पाकर गलील देश में चला गया और नासरत नाम नगर में जा बसा, ताकि वह वचन पूरा हो, जो भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा कहा गया था कि वह नासरी कहलाएगा।

[ लड़कपन ]

बालक बढ़ता गया और बलवंत होता गया और बुद्धि से परिपूर्ण होता गया और परमेश्वर का अनुग्रह उस पर था। उसके माता-पिता प्रति वर्ष  फसह के पर्व में यरूशलेम को जाया करते थे।

जब वह 12 वर्ष का हुआ, तो वे पर्व की रीति के अनुसार यरूशलेम को गए और जब वे उन दिनों को पूरा करके लौटने लगे, तो वह लड़का यीशु यरूशलेम में रह गया और यह उसके माता-पिता नहीं जानते थे। वे यह समझकर, कि वह और यात्रियों के साथ होगा, एक दिन का पढ़ाव निकल गया और उसे अपने कुटुम्बियों और जान-पहचान वालों में ढूँढने लगे।

पर जब वह नहीं मिला तो ढूंढते ढूंढते यरूशलेम को वापिस लौट गए और 3 दिन के बाद उन्होने उसे मन्दिर में उपदेशकों के बीच में बैठे, उनकी सुनते और उनसे प्रश्न करते हुए पाया और जितने उसकी सुन रहे थे, वे सब उसकी समझ और उसके उत्तरों से चकित थे।

तब वे उसे देखकर चकित रह गए और उसकी माता ने उसे कहा; हे पुत्र, तूने हमसे क्यों एसा व्यवहार क्यों किया? देख, तेरे पिता और मैं कुढ़ते हुए तुझे ढूंढते थे। उसने उन से कहा; तुम मुझे क्यों ढूंढते थे? क्या नहीं जानते थे, कि मुझे अपने पिता के भवन में होना अवश्य है? परंतु जो बात उसने उनसे कही, उन्होने उसे नहीं समझा। तब वह उनके साथ गाया और नासरत में आया और उनके वश में रहा; और उसकी माता ने ये सब बातें अपने मन में राखी और यीशु बुद्धि और डील-डौल में और परमेश्वर और मनुष्यों के अनुग्रह में बढ़ता गया।

[ माँ मरियम ]

छठवें महीने में परमेश्वर कि ओर से जिब्राईल स्वर्गदूत गलील के नासरत नगर में एक कुँवारी के पास भेजा गया। जिस की मंगनी यूसुफ नाम दाऊद के घराने के एक पुरुष के साथ हुई थी; उस कुँवारी का नाम मरियम था और स्वर्गदूत ने उसके पास भीतर आकर कहा; आनन्द और जय तेरी हो, जिस पर ईश्वर का अनुग्रह हुआ है, प्रभु तेरे साथ है।

वह उस वचन से बहुत घबरा गई और सोचने लगी, कि यह किस प्रकार का अभिवादन है? स्वर्गदूत ने उससे कहा, हे मरियम; भयभीत न हो, क्योंकि परमेश्वर का अनुग्रह तुझ पर हुआ है और देख, तू गर्भवती होगी और तेरे एक पुत्र उत्पन्न होगा; तू उसका नाम यीशु रखना।

वह महान होगा; और परमप्रधान का पुत्र कहलाएगा और प्रभु परमेश्वर उसके पिता दाऊद का सिंहासन उसको देगा और वह याक़ूब के घराने पर सदा राज्य करेगा; और उसके राज्य का अंत नहीं होगा। मरियम ने स्वर्गदूत से कहा, यह कैसे होगा? मैं तो पुरुष को जानती ही नहीं। स्वर्गदूत ने उसे उत्तर दिया; कि पवित्र आत्मा तुझ पर उतरेगा और परमप्रधान की सामर्थ तुझ पर छाया करेगी इसलिए वह पवित्र जो उत्पन्न होने वाल है, परमेश्वर का पुत्र कहलाएगा।

[ चमत्कार ]

ईसा मसीह का जीवन । क्रिसमस क्यों मनाया जाता है ? ईसा मसीह का जन्म,यीशु मसीह की कहानी,christmas day history hindi,यीशु मसीह का जन्म

ईसा मसीह का जीवन । क्रिसमस क्यों मनाया जाता है ? ईसा मसीह का जन्म,यीशु मसीह की कहानी,christmas day history hindi,यीशु मसीह का जन्म

यीशु ने और भी चिन्ह चेलों के साम्हने दिखाए, जो इस पुस्तक (बाइबल) में लिखे नहीं गए। परन्तु ये इसलिये लिखे गए हैं, की तुम विश्वास करो, की यीशु ही परमेश्वर का पुत्र है; और विश्वास करके उसके नाम से जीवन पाओ। ये बहुत अच्छे इंसान थे जिसके सिर पर हाथ रख देते वह धन्य हो जाता था येशु ने अपने जीवन में अनगिनत चमत्कार किये जो पृथ्वी पर किसी और के लिए नामुमकिन थे।

[ [धर्म-प्रचार] ]

30 साल की उम्र में ईसा ने इस्राइल की जनता को यहूदी धर्म का एक नया रूप प्रचारित करना शुरू कर दिया। उस समय 30 साल से कम उम्र वाले को सभाग्रह में शास्त्र पढ़ने के लिए और उपदेश देने के लिए नहीं दिया करते थे।

उन्होने कहा की ईश्वर (जो केवल एक ही है) साक्षात प्रेमरूप है और उस वक़्त के र्त्तमान   यहूदी धर्म की पशुबलि और कर्मकाण्ड नहीं चाहता। यहूदी ईश्वर की परमप्रिय नस्ल नहीं है, ईश्वर सभी मुल्कों को प्यार करता है।

इंसान को क्रोध में बदला नहीं लेना चाहिए और क्षमा करना सीखना चाहिए। उन्होने स्पष्ट रूप से कहा है कि वे ही ईश्वर के पुत्र हैं, वे ही मसीह हैं और स्वर्ग और मुक्ति का मार्ग हैं। यहूदी धर्म में कयामत के दिन का कोई ख़ास ज़िक्र या महत्व नहीं था, पर ईसा ने क़यामत के दिन पर ख़ास ज़ोर दिया क्योंकि उसी वक़्त स्वर्ग या नर्क इंसानी आत्मा को मिलेगा। ईसा ने कई चमत्कार भी किए।

विरोध, मृत्यु और पुनरुत्थान

ईसा अपना ही क्रूस उठाये हुए यहूदियों के कट्टरपंथी रब्बियों (धर्मगुरुओं) ने ईसा का भारी विरोध किया। उन्हें ईसा में मसीहा जैसा कुछ ख़ास नहीं लगा। उन्हें अपने कर्मकाण्डों से प्रेम था। खुद को ईश्वरपुत्र बताना उनके लिये भारी पाप था। इसलिये उन्होने उस वक़्त के रोमन गवर्नर पिलातुस को इसकी शिकायत कर दी। रोमनों को हमेशा यहूदी क्रांति का दर रहता था। इसलिये कट्टरपंथियों को प्रसन्न करने के लिए पिलातुस ने ईसा को क्रूस (सलीब) पर मौत कि दर्दनाक सजा सुनाई।

बाइबल के मुताबिक, रोमी सैनिकों ने ईसा को कोड़ों से मारा। उन्हें शाही कपड़े पहनाए, उनके सर पर कांटो का ताज सजाया और उनपर थूका और एसे उन्हें तौहीन में “यहूदियों का बादशाह” बनाया। पीठ पर अपने ही क्रूस उठवाके, रोमियों ने उन्हें गल्गता तक लिया, जहां पर उन्हें क्रूस पर लटकाना था। गल्गता पहुँचने पर, उन्हें मदिरा और पित्त का मिश्रण पेश किया गया था। उस युग में यह मिश्रण मृत्युदण्ड की अत्यंत दर्द को कम करने के लिए दिया जाता था। ईसा ने इसे इंकार किया। बाइबल के मुताबिक, ईसा दो चोर के बीच क्रूस पर लटकाया गया था।

ईसाइयों का मानना है कि क्रूस पर मरते समय ईसा मसीह ने सभी इन्सानों के पाप स्वयं पर ले लिये थे और इसलिये जो भी ईसा में विश्वास करेगा, उसे ही स्वर्ग मिलेगा। मृत्यु के 3 दिन बाद ईसा वापिस जी उठे और 40 दिन बाद सीधे स्वर्ग चले गए। ईसा के 12 शिष्यों ने उनके नये धर्म को सभी जगह फैलाया। यही धर्म ईसाई धर्म कहलाया।

ईसाइयों का यीशु के बारे में यह मान्यता है कि “मसीहा” मरियम के पुत्र के रूप में पैदा हुआ क्रिसमस की कहानी मैथ्यू की धर्म शिक्षा (गोस्पेल ऑफ मैथ्यू) में दिए गए बाइबल खातों पर आधारित है और दी ल्यूक की धर्म शिक्षा (गोस्पेल ऑफ लुके) विशेषकर इसके अनुसार यीशु मरियम को उनके पति सेंट जोसेफ के मदद से बेतलेहेम में प्राप्त हुए थे लोकप्रिय परम्परा के अनुसार इनका जन्म एक अस्तबल में हुआ था जो हर तरफ से खतरनाक जानवरों से घिरा था।

हालांकि न तो अस्तबल और न ही जानवरों का बाइबल में कोई जिक्र है हालांकि एक “व्यवस्थापक” ल्यूक 2:7 में उल्लेखित है जहां यह कहा गया है कि “वह कपड़ों में लिपटा हुआ और उसे एक चरनी में उसे रखा, क्योंकि वहाँ के सराय में उनके लिए कोई जगह नहीं थी। “पुरानी प्रतिमा विज्ञान ने, स्थिर और चरनी एक गुफा के भीतर स्थित थे (जो अभी भी चर्च बेतलेहेम में ईसाइयों के तहत मौजूद है) की पुष्टि की है।

वहाँ के जानवरों को यीशु के जन्म के बारे में फरिश्ताने बताया था। अत: उन्होने बच्चे को सबसे पहले देखा ईसाइयों का मानना है कि यीशु के जन्म यह कहा जाता है कि यह क्रिसमस सेंट जॉर्ज अराजकता को माना जाता था और अराजकता को सूर्य कि दिव्यता और चंद्रमा ईथर को बनाने के लिए शाश्वत वापसी के हलक़ों का चक्र है ड्रैगन बच्चे का पारिवारिक अवकाश बन गया था मैंने वुमन और बच्चे और एंड्रोजेन-आर्कटाइप ने इनके जन से 700 साल पहले की गई भविष्यवाणी को सच कर दिया।

ईसाइयों के लिए यीशु को याद करना या का पुनम जन्म ही क्रिसमस मानना है वहाँ कि एक बहुत ही लंबी परम्परा रही है ईसाइयों का यीशु कि कला में पूर्वी परंपरागत चर्च प्रथाओं को ईसाइयों का फास्ट यीशु के जन्म कि प्रत्याशा है, जबकि बहुत से पश्चिमी ईसाई धर्म (पश्चिमी चर्च) मनाते है आगमन के रूप में कुछ ईसाई मूल्यवर्ग में, बच्चों पुन: बताते हुई घटनाओं के नाटक में प्रदर्शन करते हैं, या वो गाने गाते हैं जो इन घटनाओं को बताते हैं।

कुछ ईसाई ईसाइयों का द्रश्य को जाना के सृजन का प्रदर्शन अपने घरों में करते है जिसे ईसाइयों का द्रश्य कहा जाता है। इसमें मुख्य पात्रों से को चित्रित करने के लिए Figurines का उपयोग करते हुए Use Suggestion Live ईसाइयों का द्रश्य है, उर चित्र विवंत भी, किए जाते हैं तथा और अधिक यथार्थवाद के साथ इस घटना को चित्रित करने के लिए कलाकारों और जीवित पशुओं का उपयोग किया जाता है।

ईसाइयों के प्रदर्शन द्रश्य में बाइबल मागी (तीन बुद्धिमान व्यक्तियों) के साथ बल्थाजर, मेल्चिओर और कैस्पर, का भी प्रदर्शन होता है हालांकि इनका नाम या संख्या बाइबल कि कहानी में कहीं नहीं है इनके बारे में कहते हैं कि बेतलेहेम के सितारों के साथ चल कर ये यीशु के पास जा पहुंचे और स्वर्ण, लोहबान और लोहबान के उपहार दिए।

सामान्यत: ईसाइयों का द्रश्य अमेरिका में, क्रिसमस कि सजावट में सार्वजनिक इमारतें भी एक बार शामिल होते हैं। इस अभ्यास से कई लव्सुइट्स कि उत्पत्ति हुई, जैसे अमेरिकन सिविल लिबर्टीज़ यूनियन यह सरकार को जो द्वारा निषिद्ध है एक धर्म, का समर्थन करते मात्रा में विश्वास संयुक्त राज्य अमेरिका संविधान 1984 में लिच बनाम दोनेल्ली (लिच वस . दोनेल्ली) में अमेरिकी उच्चतम न्यायालय ने समस के प्रदर्शन (जो) ईसाइयों का एक द्रश्य भी शामिल स्वामित्व है और शहर के द्वारा प्रदर्शित पव्तुक्केट, रोड आइलैण्ड के बारे में कहा कि ये प्रथम संशोधन का उल्लंघन नहीं करते।

[[इतिहास]]

ईसाई धर्म का मूल – कई संस्कृतिओं में एक सर्दियों का त्यौहार परम्परागत तरीके से मनाया जाने वाला सबसे लोकप्रिय त्योहार था।

इसकी वजह थी कम कृषि कार्य होता था और उत्तरी गोलार्द्ध में सर्दियों की उच्चतम शिखर होने के कारण लौमीद करते थे कि दिन लंबे और रात छोटी होगी संक्षिप्त में, क्रिसमस का त्यौहार पहले के चुचों द्वारा मानना शुरू किया गया यह सोच के कि इससे पगन रोमंस अपना धर्म बदल कर ईसाई धर्म अपना लें और साथ ही अपने भी सर्दियों के सारे त्योहार मना लेंगे। कुछ खास देवी देवता जिसे उस पन्त के लोग मानते हैं उनका भी जन्म दिन 25 दिसम्बर को मनाया जाता था।

इसमे प्रमुख है ईश्टर, बाब्यलोनियन गोद्देस्स ऑफ फेर्तिलिटी, लव, एंड वार, सोल इन्विक्टुस एंड मीथ्रास आधुनिक युग के क्रिसमस मना के उत्सव का आनंद उठाने के साथ उपहारों का भी आदान प्रदान होता है। एसी परम्परा कहता है कि निम्नलिखित सर्दियों के त्योहारों से प्रेरित है।

[ईसाई धर्म का मूल]

यह अज्ञात है कि ठीक कब या क्यों 25 दिसम्बर ईसा मसीह के जंन्म के साथ जुड़ गया। नया नियम भी निश्चित तिथि नही देता है।

सेक्स्तुस जूलियस अफ़्रीकानुस ने अपनी किताब चोनोग्रफिई, एक संदर्भ पुस्तक इसाइयों के लिए 221 ई॰ में लिखी गई, में यह विचार लोकप्रिय किया है कि मसीह 25 दिसम्बर को जन्मे थे। यह तिथि अवतार की पारंपरिक तिथि के नौ महीने के बाद कि है, जिसे अब दावत की घोषणा के रूप में मनाया जाता है। मार्च 25 को वासंती विषुव कि तारीख माना गया था और पुराने ईसाई भी मानते हैं कि इस तारीख को मसीह को क्रूस पर चढ़ाया गया था।

ईसाई विचार है कि मसीह की जिस साल क्रूस पर मृत्यु हो गई थी उसी तिथि पर वो फिर से गर्भित हुए थे जो एक यहूदी विश्वास के साथ अनुरूप है कि एक नबी कई साल का जीवित रहे थे।

[[सांता क्लॉस और अन्य तोहफे लाने वाले]]

पश्चिमी संस्कृति से उभरा हुआ, जहां छुट्टी का मतलब दोस्तों और रिश्तेदारों में उपहार लेना देना होता है वहाँ कुछ उपहार सांता क्लॉस के छवि से मिलते हैं (इन्हें और भी नामों से जाना जाता है क्रिसमस के पिता सेंट निकोलस या सेंट निलोलास, सिन्तेक्लार्स क्रिस कृंगले, पेरे नोएल, जौलुपुक्की बब्बो नाताले, वेईहनक्ट्समन कैसरिया के बेसिल और डेड मोरोज़ (पिता फ्रॉस्ट)

सांता क्लॉस की लोकप्रिय छवि को जर्मन मूल के अमेरिकी कार्टूनिस्ट थॉमस नस्ट (1840-1902) के द्वारा बनाया गया, जो हार साल एक नई छवि को बनाते थे, 1863 से शुरू 1880 तक, नस्त जिसे अब हम सांता कहते हैं उसके पहचान बनी छवि को 1920 के दशक में विज्ञापनदाताओ के द्वारा मानकीकृत किया गया।

फादर क्रिसमस जो सांता की छवि को Predate करते हैं उनका चरित्र सबसे पहले 15 संतुरी में प्रयोग में आए परंतु ये सिर्फ छुट्टी मेर्रीमेकिंग और मतवालापन के साथ होता है विक्टोरियन ब्रिटेन, में उसकी छवि का पुनर्निमाण किया ताकि वो सांता की छवि से मिल सके फ्रेंच पेरे नोएल भी सांता के तर्ज पैर ही काम करते हैं इटली में मन जाता है कि बब्बो नाताले सांता कि तरह काम का करती है जबकि ला बेफाना खिलोने लेट है जो घोषणा के पूर्व संध्या पैर आती है कहा जाता है कि ला बेफाना को छोटे येशु के लिए खिलौने लेने के लिए भेजा गया था वो रास्ते में भटक गयी अब वो सभी बच्चों के लिए उपहार लाती है कुछ सभ्यताओं में सांता क्लॉज के साथ क्नेच्त रुप्रेच्त या ब्लैक पीटर भी होते हैं अन्य संस्करणों में, अप्सराओं ने खिलौने बनाये उसकी पत्नी श्रीमती क्लॉस के रूप में संदर्भित किया जाता है।

लैटिन अमेरिका के देशों (जैसे वेनेजुएला में जो परम्परा आज भी चली आ रही है उसके अनुसार सांता खिलौने बना कर बालक यीशु को देता है जो असल में सभी बच्चों के घर इसे पहुंचाते हैं यह कहानी एक पुराण धार्मिक मान्यताओं और आज के आधुनिक युग में विश्वीकरण से मिलकर बनी है, सबसे खासकर सांता क्लॉस के प्रतिमा विज्ञान जो संयुक्त राज्य अमेरिका से आयात से प्रभावित है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *